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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Paksha to Pitara  )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Paksha - Panchami  ( words like Paksha / side, Pakshee / Pakshi / bird, Panchachuudaa, Panchajana, Panchanada, Panchamee / Panchami / 5th day etc. )

Panchamudraa - Patanga ( Pancharaatra, Panchashikha, Panchaagni, Panchaala, Patanga etc. )

Patanjali - Pada ( Patanjali, Pataakaa / flag, Pati / husband, Pativrataa / chaste woman, Patnee / Patni / wife, Patnivrataa / chaste man, Patra / leaf, Pada / level etc.)

Padma - Padmabhuu (  Padma / lotus, Padmanaabha etc.)

Padmamaalini - Pannaga ( Padmaraaga, Padmaa, Padmaavati, Padminee / Padmini, Panasa etc. )

Pannama - Parashunaabha  ( Pampaa, Payah / juice, Para, Paramaartha, Parameshthi, Parashu etc. )

Parashuraama - Paraashara( Parashuraama, Paraa / higher, Paraavasu, Paraashara etc)

Parikampa - Parnaashaa  ( Parigha, Parimala, Parivaha, Pareekshita / Parikshita, Parjanya, Parna / leaf, Parnaashaa etc.)

Parnini - Pallava (  Parva / junctions, Parvata / mountain, Palaasha etc.)

Palli - Pashchima (Pavana / air, Pavamaana, Pavitra / pious, Pashu / animal, Pashupati, Pashupaala etc.)

Pahlava - Paatha (Pahlava, Paaka, Paakashaasana, Paakhanda, Paanchajanya, Paanchaala, Paatala, Paataliputra, Paatha etc.)

Paani - Paatra  (Paani / hand, Paanini, Paandava, Paandu, Pandura, Paandya, Paataala, Paataalaketu, Paatra / vessel etc. )

Paada - Paapa (Paada / foot / step, Paadukaa / sandals, Paapa / sin etc. )

 Paayasa - Paarvati ( Paara, Paarada / mercury, Paaramitaa, Paaraavata, Paarijaata, Paariyaatra, Paarvati / Parvati etc.)

Paarshva - Paasha (  Paarshnigraha, Paalaka, Paavaka / fire, Paasha / trap etc.)

Paashupata - Pichindila ( Paashupata, Paashaana / stone, Pinga, Pingala, Pingalaa, Pingaaksha etc.)

Pichu - Pitara ( Pinda, Pindaaraka, Pitara / manes etc. )

 

 

वेदाध्ययन - अध्यापन कार्यशाला

वेद संस्थान

 C २२, राजौरी गार्डन

नई दिल्ली - ११००२७

वेद संस्थान, नई दिल्ली में डा. अभयदेव शर्मा जी के निर्देशन में चौथी वेद अध्ययन - अध्यापन कार्याशाला का आयोजन दिनांक ३-७-२००९ से ६-७ - २००९ तक ( आषाढ शुक्ल द्वादशी से आषाढ पूर्णिमा, विक्रम संवत् २०६६) तक किया गया ।

कार्यशाला के तृतीय दिवस का मन्त्र --

एकपाद् भूयो द्विपदो वि चक्रमे द्विपात्त्रिपादमभ्येति पश्चात् ।

चतुष्पादेति द्विपदामभिस्वरे संपश्यन् पङ्क्तीरुपतिष्ठमान: ।। - ऋग्वेद १०.११७.८

अथर्ववेद शौनक संहिता १३.२.२७ में ऋग्वेद के उपरोक्त मन्त्र का रूपान्तर प्राप्त होता है --

एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात् ।

द्विपाद्ध षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एकपदस्तन्वं समासते ।। - अथर्व शौनक १३.२.२७

इसकी व्याख्या में गोपथ ब्राह्मण १.२.९ का कथन है कि वायु ही एकपाद है । आकाश उसका पाद है । चन्द्रमा द्विपाद है । पूर्वपक्ष और अपरपक्ष उसके दो पाद हैं । आदित्य त्रिपाद है । यह लोक ही उसके पाद हैं । अग्नि षट्पाद है । उसके पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः, ओषधि - वनस्पति और यह भूत पाद हैं । इन सबमें वेद गति और आत्मा प्रतिष्ठित हैं ।

अथर्ववेद शौनक संहिता १३.३.२५ में उपरोक्त मन्त्र का दूसरा रूपान्तर प्रकट होता है --

एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात् ।

चतुष्पाच्चक्रे द्विपदामभिस्वरे संपश्यन् पङ्क्तिमुपतिष्ठमानस्तस्य देवस्य । - - - अथर्ववेद शौनक १३.३.२५

          ऋग्वेद के उपरोक्त सूक्त(१०.११७.८) का ऋषि भिक्षु आंगिरस है । देवता धन - अन्नदान है । पहली व दूसरी ऋचाओं का छन्द जगती है, शेष सात ऋचाओं का त्रिष्टुप् । आंगिरस विशेषण का अर्थ है - जो धीरे - धीरे अपनी साधना में प्रगति करता है । देवगण त्वरित गति से प्रगति करने वाले होते हैं - विद्युत की गति से । मनुष्य का कार्य धीरे - धीरे चलता है, वैसे ही जैसे मनुष्य का मस्तिष्क बहुत धीमी गति से सोचता है, कम्प्यूटर बहुत जल्दी सोचता है । कार्यशाला के प्रतिभागियों द्वारा यह ऊहापोह की गई  कि चूंकि ऋषि भिक्षु है, अतः उसका उद्देश्य भिक्षा में अधिक से अधिक धन प्राप्त करना रहा होगा । इसी कारण से इस मन्त्र में कहा जा रहा होगा कि भिक्षा में जो धन प्राप्त हुआ, उसका यदि बटवारा किया जाए तो स्वाभाविक रूप से एकभाग धन वाला पुरुष उस पुरुष के पीछे चलेगा जिसको दो भाग धन प्राप्त हुआ है, दो भाग धन वाला पुरुष तीन पाद धन वाले पुरुष के पीछे चलेगा । लेकिन मन्त्र की दूसरी पंक्ति में यह क्रम टूटा हुआ मिलता है । वहां चार भाग धन वाले पुरुष को दो भाग धन वाले पुरुष के पीछे चलता हुआ कहा गया प्रतीत होता है । और फिर कहा गया है कि पंक्ति को देखते हुए (संपश्यन्) वह बैठ जाता है(उपतिष्ठमान:) । सायण भाष्य इसी आधार पर किया गया है । लेकिन अभयदेव जी द्वारा इस सूक्त की व्याख्या का आरम्भ वामन द्वारा अपने पदों द्वारा ब्रह्माण्ड के मापन से किया गया । उन्होंने ध्यान दिलाया कि मन्त्र की दूसरी पंक्ति में जो 'अभिस्वरे' शब्द प्रकट हो रहा है, वह यह संकेत करता है कि यहां स्थूलता के त्याग का संदर्भ है । वर्णमाला में जब व्यंजन अपनी स्थूलता त्यागते हैं, तब स्वर बनते हैं । अतः मन्त्र कह रहा है कि स्थूलता त्याग का क्रम एक पाद से आरम्भ होता है । उससे अगला चरण द्विपाद है, उससे अगला स्तर त्रिपाद का, उससे अगला स्तर चतुष्पाद का । और कहा गया है कि चार पाद स्थूलता वाले की निगाह पंक्ति पर रहती है । पंक्ति पांच से बनती है । अतः लक्ष्य पांच पादों पर स्थूलता के त्याग का होना चाहिए ।

                    सोमयाग में विभिन्न कृत्यों के आरम्भ व अन्त में सुब्रह्मण्या आह्वान होता है जिसके कुछ शब्द इस प्रकार हैं (, आपस्तम्बीय श्रौतसूत्रम् १०.२८.५, षड्-विंश ब्राह्मण १.२) -

- - - - सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते पृथिवी पाद: । सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते अन्तरिक्षं पाद: । सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते द्यौ: पाद: । सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते दिशः पाद: । परोरजास्ते पंचम: पाद: । सा न इषमूर्जं तेज इन्द्रियं ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमिति

इस सुब्रह्मण्या निगद से संकेत मिलता है कि पांचवां पाद परोरजा, रज से, स्थूलता से परे है । अतः लक्ष्य उसी पाद की प्राप्ति का है ।

           मन्त्र का आरम्भ एकपाद से होता है । यदि यह समझ लिया जाए कि एक पाद क्या हो सकता  है, तो आगे के पादों को समझने में सरलता होगी । पुराणों में धर्म के चार पाद युक्त होने के उल्लेख मिलते हैं । कहा जाता है कि विभिन्न युगों में वृषभ रूप धर्म के पादों की संख्या भिन्न भिन्न होती है । भागवत पुराण १.१६.१८ में एक पाद वाले वृषभ रूप धारी धर्म की कथा आती है जिसके संदर्भ में कहा गया है कि कृतयुग में धर्म चार पादों से युक्त होता है । यह चार पाद हैं - तप, शौच, दया और सत्य । कलियुग आने पर धर्म केवल सत्य नामक पाद से युक्त रहता है जिसको कलियुग काटना चाहता है । धर्म के इन चार पादों को अधर्म के चार पादों की सहायता से समझा जा सकता है । धर्म के अन्तिम पाद सत्य को अनृत या द्यूत के रूप में समझा जा सकता है । महाभारत में यक्ष युधिष्ठिर से प्रश्न पूछता है कि एकपद धर्म्य कौन सा है, एकपद यश कौन सा है, एकपद स्वर्ग्य कौन सा है, एकपद सुख कौन सा है । उत्तर है कि दाक्ष्य एकपद धर्म्य है, दान एकपद यश है, सत्य एकपद स्वर्ग्य है और शील एकपद सुख है । ऐसा लगता है कि यह चार एकपद सत्य के ही क्रमिक विकास हैं । सबसे पहले द्यूत से ऊपर उठकर दक्षता प्राप्ति करनी होती है । तभी सत्य रूपी पाद की प्राप्ति हो सकती है । जब एकपद धर्म/धर्म्य के रूप में दक्षता प्राप्ति का निश्चय हो गया, तो अन्य तीन पादों का अनुमान सोमयाग की चार दिशाओं से लगाया जा सकता है । दक्षिण दिशा दक्षता प्राप्ति की दिशा है । पश्चिम दिशा कर्मफलों के नाश की, श्मशान भूमि की दिशा है । उत्तरदिशा आनन्द की दिशा है । पूर्व दिशा ज्ञान की दिशा है । लिङ्ग पुराण १.४९.२५ में मेरु पर्वत की चार दिशाओं में उसके पाद रूप चार पर्वतों के नामों का उल्लेख है । पूर्व दिशा में मन्दर पर्वत, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व पर्वत स्थित हैं ।

           एकपाद को और अधिक समझने के लिए शतपथ ब्राह्मण १४.६.१०.२/बृहदारण्यक उपनिषद  ४.१.१ के आख्यान का आश्रय लिया जा सकता है । आख्यान इस प्रकार है - ऋषि याज्ञवल्क्य जनक के पास पहुंच गए । जनक ने बताया कि एक ऋषि ने उनसे कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने जनक से प्रश्न किया कि फिर जो प्राण से रहित हैं, उनका क्या होगा? उनका क्या आयतन है, क्या प्रतिष्ठा है, क्या यह उस ऋषि ने बताया ? जनक ने कहा कि यह तो उस ऋषि ने नहीं बताया । याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे सम्राट्, यह एकपाद है । जो अप्राणी है, प्राण ही उनका आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, प्रिय रूप में इसकी उपासना करे । जनक ने पूछा कि प्रिय से क्या तात्पर्य है । याज्ञवल्क्य ने कहा कि जो प्रिय होता है, उसके लिए मनुष्य अकरणीय कार्य भी करने को तैयार हो जाता है । ऐसे ही प्राण के लिए मनुष्य कुछ भी करने को तैयार हो जाता है । प्राण ही परम ब्रह्म है । इसी प्रकार एक दूसरे ऋषि ने जनक को कहा कि वाक् ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने जनक से पूछा कि जो बोलते ही नहीं हैं, उनका क्या होगा? उनका आयतन और प्रतिष्ठा क्या होगी ? उत्तर दिया कि यह एकपाद है । वाक् ही उनका आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी प्रज्ञा रूप में उपासना करे । जनक ने पूछा कि प्रज्ञा क्या होती है । याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वाक् के द्वारा ही सम्राट्बन्धु का प्रज्ञान होता है । ऋग्वेद आदि का प्रज्ञान वाक् द्वारा ही होता है । एक ऋषि ने जनक से कहा कि चक्षु ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने कहा कि क्या तुमने उनसे पूछा कि जो नहीं देखते, उनका क्या होगा? उनका आयतन और प्रतिष्ठा क्या होगी? फिर उत्तर दिया कि यह एकपाद है । चक्षु उसका आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है । सत्य के रूप में इसकी उपासना करे । सत्यता क्या होती है, इसका उत्तर यह दिया गया कि  आंखों से देखने पर ही किसी घटना के बारे में सच्चाई से कहा जा सकता है कि हां, मैंने अपनी  आंखों से देखा है । एक ऋषि ने जनक को कहा कि श्रोत्र ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने प्रश्न किया कि क्या उसने यह भी बताया है कि जिनके कान/ श्रोत्र नहीं हैं, उनका क्या होगा ? उनका क्या आयतन है, क्या प्रतिष्ठा है? उत्तर दिया कि वह एकपाद है । श्रोत्र ही उसका आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, अनन्त रूप में इसकी उपासना करे । अनन्तता क्या है, इसका उत्तर यह है कि दिशाएं ही अनन्त हैं । एक ऋषि ने कहा कि मन ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने पूछा कि फिर अ - मन वालों का क्या होगा? उसका क्या आयतन है, क्या प्रतिष्ठा है । फिर उत्तर दिया कि वह एकपाद है । मन ही उसका आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है । आनन्द रूप में इसकी उपासना करे । आनन्दता क्या है, इस प्रश्न का उत्तर यह दिया कि मन से स्त्री की कामना करता है । उस स्त्री से उसका प्रतिरूप पुत्र उत्पन्न होता है । वह आनन्द है । एक ऋषि ने कहा कि हृदय ही ब्रह्म है । याज्ञवल्क्य ने पूछा कि जिनमें हृदय नहीं है, उनका क्या होगा ? उसका क्या आयतन होगा, क्या प्रतिष्ठा होगी? फिर उत्तर दिया कि यह एकपाद है । हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है । स्थिति रूप में इसकी उपासना करे । स्थिति क्या होती है, इसका उत्तर यह दिया कि हृदय ही सब भूतों की प्रतिष्ठा है । हृदय से ही सब भूत प्रतितिष्ठित होते हैं । इस आख्यान में परोक्ष रूप में इसकी व्याख्या की गई है कि एकपाद क्या होता है

          षड्-विंश ब्राह्मण १.३.१ का कथन है कि चलते समय पुरुष एक पाद पर स्थित रहता है और दूसरा पाद आगे बढाता है । अतः वह एकपाद है । ऋग्वेद ६.४७.१५ की ऋचा का अपरार्द्ध दो पादों के रहस्य को स्पष्ट करता है -

पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः ।। - ऋ. ६.४७.१५

अर्थात् जैसे चलते समय दोनों पैरों को आगे बढाते हैं, एक पैर दूसरे का पीछा करता है, यह पता नहीं लगता कि कौन सा पैर पहले है, कौन सा बाद में, इसी प्रकार शचियों द्वारा पूर्व को अपर बना लिया जाता है । शची वाक् के व्यक्त स्वरूप को कहते हैं, अर्थात् जो वाक् गर्भ में न रहकर अब व्यक्त हो गई है, उसके द्वारा । यहां पूर्व और अपर शब्द संकेत दे रहे हैं कि यह कारण - कार्य का प्रसंग है । कारण पूर्व होता है, कार्य बाद में । लेकिन ऐसा भी संभव है कि इस क्रम का विपर्यय हो जाए । और जब वैदिक साहित्य एकपाद की बात करता है, तो उससे तात्पर्य यह हो सकता है कि वहां कारण - कार्य की शृङ्खला का निर्माण नहीं होता । और इतना ही नहीं, ऋग्वेद की एक ऋचा अपाद - अहस्त की बात करती है ।

 

सोमयाग में दो वेदियां बनती हैं जिन्हें प्राग्वंश और उत्तरवेदी कहा जाता है । प्राग्वंश में मुख्य रूप से तीन अग्नियां होती हैं - गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय । यजमान - पत्नी(प्रकृति का रूप?) गार्हपत्य के समीप आसीन होती है जबकि यजमान(पुरुष का रूप?) आहवनीय अग्नि के समीप आसीन होता है । सोमयाग के कुछ प्रारम्भिक कृत्य प्राग्वंश में किए जाते हैं और जब अतिथि रूप में ग्रहण किए गए सोम की प्रतिष्ठा पूर्ण हो जाती है तो प्राग्वंश को त्याग कर उत्तरवेदी में स्थान्तरण किया जाता है । उत्तरवेदी में स्थित होने पर प्राग्वंश की आहवनीय अग्नि, जिसे पुरातन आहवनीय भी कहते हैं, की संज्ञा अज एकपाद होती है ( ताण्ड्य ब्राह्मण १.४.१२) । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.२.८ में सूर्य देव को अज एकपाद कहा गया है । यह प्रसंग पूर्वा प्रोष्ठपदा (पूर्वा भाद्रपद) नक्षत्र का है । कहा गया है कि प्रोष्ठपदास: रूप सारे देव अज एकपाद का अनुसरण करते हैं । प्रोष्ठ एक वृषभ को भी कहते हैं ।

          छान्दोग्योपनिषद ३.१८.१ में मन को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है जिसका अधिदैवत रूप आकाश है । इस मन रूप ब्रह्म के चार पादों के रूप में वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र गिनाएं गए हैं । कहा गया है कि वाक् पाद को शक्ति अग्नि की ज्योति से प्राप्त होती है । प्राण पाद को शक्ति वायु की ज्योति से प्राप्त होती है । चक्षु पाद को शक्ति आदित्य की ज्योति से प्राप्त होती है । श्रोत्र पाद को शक्ति दिशाओं की ज्योति से प्राप्त होती है ।

          छान्दोग्योपनिषद ३.१२.५ में गायत्री के चार पद कहे गए हैं - पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इति (पुरुष सूक्त, ऋग्वेद १०.९०.३) ।

          ब्रह्मोपनिषद में पुरुष के चार स्थान कहे गए हैं - नाभि, हृदय, कण्ठ और मूर्द्धा । वहां चतुष्पाद ब्रह्म शोभायमान होता है । इस चतुष्पाद ब्रह्म को जाग्रत, स्वप्न, सुषnप्ति और तुरीय कहा जा सकता है, या ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और परमाक्षर कहा जा सकता है । जाग्रत स्थिति में ब्रह्मा, स्वप्न में विष्णु, सुषुप्ति में रुद्र और परमाक्षर में तुरीय होता है । जाग्रत आदि स्थितियों की व्याख्या करते समय कहा गया है कि सुषnप्ति स्थिति वह है जहां बाह्य संसार के सुख - दुःख से प्रभावित नहीं होता । स्वप्न स्थिति निष्काम आनन्द की स्थिति है । जाग्रत स्थिति वह कही गई है जहां पर अपर का त्याग नहीं करता । इसका अर्थ यह हो सकता है कि बाह्य कर्म करते हुए भी वह अन्तरात्मा से निर्देश प्राप्त करता रहता है ।

          माण्डूक्योपनिषद में आत्मा को चतुष्पाद कहा गया है । यह चार पाद जाग्रत, स्वप्न, सुषnप्ति और तुरीय हैं जिन्हें वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ और xxx कहा गया है । इन चार पादों को ओंकार की क्रमशः अ, , म और अमात्रा/अर्धमात्रा कहा गया है । चौथी मात्रा जिसे अमात्रा या अर्धमात्रा कहा गया है, वही विज्ञेय है । माण्डूक्योपनिषद के इस कथन की पुनरावृत्ति नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद ४., नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद १ तथा रामोत्तरतापिन्युपनिषद ३ में भी हुई है और इस पुनरावृत्ति से इसके महत्त्व का अनुमान लगाया जा सकता है । रामोत्तरतापिन्युपनिषद में अकार का साम्य लक्ष्मण से, उकार का शत्रुघ्न से, मकार का भरत से और अर्धमात्रा का राम से किया गया है ।

          मैत्रायणी उपनिषद ६.४ में ब्रह्म की उपमा एक ऐसे अश्वत्थ वृक्ष से की गई है जिसका मूल ऊपर है और शाखाएं नीचे । इन शाखाओं को त्रिपाद् ब्रह्म कहा गया है । लिङ्गभेद से यह तीन पाद स्त्री, पुरुष और नपुंसक हो सकते हैं, ज्योतिभेद से अग्नि, वायु, आदित्य, अधिपति भेद से ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु, मुखभेद से गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय, विज्ञानभेद से ऋक्, यजु और साम, लोकभेद से भू:, भुव: और स्व:, कालभेद से भूत, भव्य और भविष्य, प्रतापभेद से प्राण, अग्नि और सूर्य, आप्यायनभेद से अन्न, आपः और चन्द्रमा, चेतनभेद से बुद्धि, मन और अहंकार, प्राणभेद से प्राण, अपान और व्यान । फिर मैत्रायणी उपनिषद ७.११ में कहा गया है कि ब्रह्म दो प्रकार का हो सकता है - एक वह पूर्व रूप जो तीन में एकपाद होकर विचरण करता है और दूसरा उत्तर रूप जो त्रिपाद है - ''त्रिष्वेकपाच्चरेद् ब्रह्म त्रिपाच्चरति चोत्तरे ।''

          त्रिपाद और चतुष्पाद क्या हो सकता है, इस संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १३.२.७.६ का यह कथन उपयोगी हो सकता है कि सामान्य रूप से अश्व तीन पदों पर खडा होता है । एक पाद वह भूमि से ऊपर उठाए रखता है । लेकिन जब उसे रथ में जोड दिया जाता है तो वह चार पादों पर प्रतिष्ठित हो जाता है ।

मन्त्रार्थ : अब हम ऋग्वेद के मन्त्र के अर्थ पर विचार करते हैं । यह जानना उपयुक्त होगा कि सूक्त के ऋषि भिक्षु आङ्गिरस का उद्देश्य क्या है । भिक्षु का अर्थ भिषक् भी हो सकता है । क्ष पूर्व रूप होता है, ष उत्तर रूप । सूक्त के प्रथम मन्त्र में ऋषि कह रहा है कि

 

न वा उ देवा: क्षुधमिद्वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यव: ।

उतो रयिः पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन् मर्डितारं न विन्दते ।।

- क्षुधा जैसा मारक अस्त्र और कोई नहीं है और यदि इस क्षुधा को शान्त करने के लिए भोजन किया जाता है तो तब वह भोजन भी मृत्यु की ओर ही ले जाता है (क्योंकि वह प्राणों को शान्त कर देता है । फिर तो वह प्राण ही निर्जीव से हो जाते हैं ) । आदर्श भोजन तो कोई सोम जैसा अमृत ही हो सकता है जहां प्राण भी मृत न हो पाएं और क्षुधा भी शान्त हो जाए । कहा गया है कि यदि रयि का प्रीणन् किया जाए, उसे प्रसन्न किया जाए तो यह हानि नहीं पहुंचाती है ( उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति ) । यह रयि क्या हो सकती है जिसको प्रसन्न करने की आवश्यकता पडती है, इस बारे में स्थिति बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है । जैसा कि इस प्रतिवेदन में आगे चलकर बताया जाएगा, एक अनुमान यह है कि यह कुण्डलिनी शक्ति है, शेषनाग की पत्नी है । इसकी विशेषता यह है कि जब हमारी चेतना पर भोजन का भार नहीं रहता, तभी इसका ऊर्ध्वमुखी विकास होता है । और एक बार साधक का ऊर्ध्वमुखी विकास प्रयत्न से अथवा नैसर्गिक रूप में भी आरम्भ हो गया तो फिर यह कुण्डलिनी शक्ति शान्त होने का नाम नहीं लेती । फिर तो यह साधक की बहिर्मुखी वृत्तियों का नाश करके ही छोडती है, अन्यथा साधक को मार देती है । अतः मन्त्र कह रहा प्रतीत होता है कि रयि के प्रीणन का यदि ध्यान रखा जाए तो यह 'न उपदस्यति' - स्वयं क्षय को प्राप्त नहीं होती अथवा हानि नहीं पहुंचाती । दोनों अर्थ हो सकते हैं । प्रश्नोपनिषद में उल्लेख आता है कि प्रजापति ने प्राण और रयि के मिथुन को उत्पन्न किया । प्राण सूर्य का विकृत रूप हैं और रयि चन्द्रमा का । एक शुक्ल पक्ष है, एक कृष्ण पक्ष । एक देवयान है, एक पितृयाण । यदि देवयान और पितृयाण शब्दों को भूल जाएं तो यह कहा जा सकता है कि प्राण और रयि मिलकर खोई हुई सममिति की पूर्ति करते हैं । क्षुधा के उत्पन्न होने का कारण यही हो सकता है कि जठर में स्थित कोशिकाओं की सममिति का ह्रास हो गया हो । उस सममिति की पूर्ति भोजन के कणों द्वारा हो जाती है ।

          पुराणों में परोक्ष रूप से रयि की व्याख्या की गई है, जैसे रेवा(रयि वा ) या नर्मदा नदी का माहात्म्य, रेवती (रयिवती ) । रयि क्या है, यह जान लेना सूक्त को समझने के लिए आवश्यक है । रयि इत्यादि का विकास इळा से कहा गया है (जैमिनीय ब्राह्मण २.१६) । इळा के बारे में श्री अरविन्द आदि चिन्तकों ने अनुमान लगाया है कि यह अचेतन मन का प्रतिनिधित्व करती है । अतः अचेतन मन पर नियन्त्रण पाना रयि का प्रीणन हो सकता है । दूसरी ओर क्षुधा है जिसका नियन्त्रण करना बहुत कठिन है । पुराणों की कथा में राजा दुर्दम का विवाह रेवती कन्या से कर दिया जाता है । यह दुर्दम यही क्षुधा हो सकती है जिसका दमन कठिन है । और रेवती ऋग्वेद की रयि हो सकती है । पुराणों में आनर्त देश के राजा से रेवती कन्या के जन्म का उल्लेख है । आनर्त आ - नृत्य, अत्यन्त आनन्द की कोई स्थिति है जिसका नियन्त्रण करने की आवश्यकता पडती है । आनन्द पर नियन्त्रण की परिणति रेवती/रयि रूप में होती है । पुराणों से ऐसा भी संकेत मिलता है कि कुण्डलिनी शक्ति रेवती है ।

 इससे आगे मन्त्र के चतुर्थ पाद में प्रीणन न होने पर मर्डिता के प्राप्त न होने का उल्लेख है । यह मर्डिता, हर्षदाता कौन है, यह स्पष्ट नहीं है । लेकिन मर्डिता के प्राप्त न होने का उल्लेख दूसरे मन्त्र में भी है । अतः यह इस सूक्त का केन्द्रीय बिन्दु प्रतीत होता है । और इसका उत्तर इस प्रतिवेदन के अन्त में अन्य मन्त्र (ऋ. १०.६४.२) से प्राप्त होता है ।

          सातवें मन्त्र में ऋषि कहता है कि फाल से कर्षण करके भोजन योग्य बना लेता है (कृषन्नित् फाल आशितं कृणोति ) । ऐसा कहा जा सकता है कि यह फाल किसी प्रकार से मन और प्राणों के संयोग से ही निर्मित होता होगा । पुराणों की कथा में बलराम ने अपने हल के फाल से कर्षण करके रेवती को नीची बना लिया था । यह उल्लेखनीय है कि पुराणों की कथाओं में कुल मिलाकर वाक्, प्राण और मन के त्रिक् का समावेश है । वर्तमान सूक्त में वाक् किस प्रकार से निहित है, यह अन्वेषणीय है ।

          आठवें मन्त्र में, जो इस कार्यशाला का वास्तविक मन्त्र है, एकपाद से द्विपाद बनने तथा द्विपाद से त्रिपाद बनने की बात कही गई है । एकपाद से द्विपाद तभी बनता है जब एकपाद भूयः, बहुत हो जाए । जैसा कि ऊपर अन्य ग्रन्थों के विश्लेषण से निष्कर्ष निकाला जा सकता है, एकपाद की एक विशेषता दाक्ष्य, दक्षता प्राप्त करना है । और पर्याप्त दक्षता प्राप्ति के पश्चात् उस दक्षता का निचले स्तरों पर अवतरण कराना है । यह एकपाद समाधि की अवस्था हो सकता है । लगता है कि उत्तरोत्तर निचले कोशों के प्राण भिक्षु हैं ( जबकि उच्चतर कोषों के प्राण भिषक् हैं )। इस सूक्त के मन्त्रों में 'पृणतः, पृणन्तम्, पृणीयात् , पृणन् , पृणीतः शब्द प्रकट हुए हैं जिनका अर्थ सायण भाष्य में दान के अर्थ में किया गया है क्योंकि वैदिक निघण्टु में पृणाति शब्द का वर्गीकरण दानार्थक नामों में किया गया है । धातुकोश की दृष्टि से पृणन् शब्द पृञ् धातु से बनता है जिसका प्रयोग प्रीति अर्थ में होता है । इसका अर्थ होगा कि हमारी चेतना के विभिन्न कोशों में परस्पर प्रीति नहीं है, वैर है । यह वैर समाप्त हो तो एकपाद से द्विपाद, द्विपाद से त्रिपाद, चतुष्पाद आदि बन सकते हैं । पॄ धातु से भी पृणन् शब्द बनता है । यह धातु पालन और पूरण अर्थों में है । यह उल्लेखनीय है कि पुरुष सूक्त( ऋग्वेद १०.९०.४) और बृहदारण्यक उपनिषद में जिस उद्देश्य के लिए एकपाद की कल्पना की गई है ( कि अप्राण, अमन, अचक्षु, अश्रोत्र, अवाक् आदि की प्रगति का क्या होगा ? ), वैसा प्रश्न कम से कम प्रत्यक्ष रूप में तो वर्तमान सूक्त में नहीं है । मन्त्र ८ के तृतीय पाद में अभिस्वरण करने पर चतुष्पाद के द्विपाद में रूपान्तरित हो जाने का उल्लेख है (चतुष्पादेति द्विपदामभिस्वरे ) । यहां यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के दो पादों के लिए दो संभावनाएं हैं - या तो वह चतुष्पाद पशुओं की भांति तिर्यक् दिशा में चरण करे, अथवा ऊर्ध्व - अधो दिशा में चारण करे । अतः मन्त्र कहता है कि यदि अभिस्वरण किया जाए, यदि स्थूलता को दूर किया जाए तो चतुष्पाद द्विपाद में बदल सकता है ।

          डा. फतहसिंह का मानना है कि चतुष्पाद के रूप में विज्ञानमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश और अन्नमय कोश का स्थान है । जिसकी चेतना इन चार कोशों में रहेगी, वह चतुष्पद प्राणी, पशु कहलाएगा । यह चार पाद हिरण्यय कोश के हैं । इसके विपरीत, मनुष्य की चेतना के दो पाद हैं - आनन्दमय और विज्ञानमय एक पाद है और मनोमय, प्राणमय तथा अन्नमय दूसरा पाद है । द्विपाद पुरुष का एक दूसरा रूप भी है । वह है - मनोमय कोश द्विपाद है और अन्नमय और प्राणमय कोश उसके दो पाद हैं ।

 

त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातंत्रं प्रचक्षते । भोगमोक्षक्रियाचर्याह्वया पादा: प्रकीर्तिता: । पादार्थास्तु पशुपति: पशुपाशास्त्रय एव हि । पतिस्तत्र शिवो ह्येको जीवास्तु पशव: स्मृता: । - - - नारद पुराण १.६३.१३

ज्ञानं क्रिया च चर्या च योगश्चेति सुरेश्वरि । चतुष्पाद: समाख्यातो मम धर्मस्सनातनः । पशुपाशपतिज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते । षड्ध्वशुद्धिर्विधिना गुर्वधीना क्रियोच्यते । वर्णाश्रमप्रयुक्तस्य मयैव विहितस्य च । ममार्च्चनादिधर्मस्य चर्य्या चर्य्येति कथ्यते । मदुक्तेनैव मार्गेण मय्यवस्थितचेतस: । वृत्त्यंतरनिरोधो यो योग इत्यभिधीयते । - - शिव पुराण ७.२.१०.३०

पादा धर्मस्य चत्वारो यैरिदं धार्यते जगत् । ब्रह्मचर्येण व्यक्तेन गृहस्थेन च पावने । गुरुभावेन वाक्येन गुह्यगामिनगामिना । इत्येते धर्मपादा: स्यु: स्वर्गहेतो: प्रचोदिता: ।। न्यायाद् धर्मेण गुह्येन सोमो वर्धति मण्डले । ब्रह्मणो ब्रह्मचरणाद् वेदा वर्तन्ति शाश्वता: ।। गृहस्थानभि वाक्येन तृप्यन्ति पितरस्तथा । ऋषयोऽपि च धर्मेण नगस्य शिरसि स्थिता: ।।- हरिवंश पुराण ३.१७.३०

धर्मस्य प्रथम: पाद: सत्यामेतच्छ्रुतेर्वच: । द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयक: । दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै । - देवीभागवत पुराण ४.४.१४

          जैसा कि शतपथ ब्राह्मण आदि का कथन है, दान बहु अर्थ वाचक शब्द है जिनमें से दक्षता प्राप्त करना सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि किसी वस्तु में दक्षता प्राप्ति के पश्चात् ही उसका दान किया जा सकता है । दान की ही भांति पुराणों के तप, शौच और दया शब्दों का अर्थ भी अन्वेषणीय है ।

पातञ्जल योग दर्शन में चार पाद हैं - समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद । समाधि पाद का आरम्भ योगश्चित्तवृत्ति निरोध: सूत्र से कहा जा सकता है । साधनपाद का आरम्भ तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग: से होता है । विभूति पाद का आरम्भ देशबन्धश्चित्तस्य धारणा, फिर ध्यान, फिर समाधि सूत्रों से होता है । कैवल्यपाद का आरम्भ जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजा: सिद्धयः से होता है ।

          शतपथ ब्राह्मण १४.८.१५.१०/बृहदारण्यक उपनिषद ५.१५.१० में गायत्रब्रह्मोपासना उपनिषद के संदर्भ में निम्नलिखित यजु का उल्लेख है -

गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापत् इति । इसकी व्याख्या में कहा गया है कि गायत्री के ८ - ८ अक्षरों वाले तीन पाद होते हैं । इनमें से पहला पाद भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ का प्रतिनिधित्व करता है । दूसरा पाद ऋक्, यजु और साम का । यह त्रयी विद्या है जिस पर जय प्राप्त करनी है । तीसरा पाद प्राण, अपान और व्यान का प्रतिनिधित्व करता है । इससे आगे एक तुरीय दर्शतं पदं है । इसे परोरज: पद कहते हैं । इसे दर्शतं पदं इसलिए कहते हैं कि यह ददृश है ( अमावास्या की भांति न दिखाई देने वाला?) । यही सत्य पद है ।

कार्यशाला के चतुर्थ दिवस(बुध पूर्णिमा) का मन्त्र --

कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वता मनामहे ।

को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम ऊती अभ्या ववर्तति ।। - ऋग्वेद १०.६४.१

          १७ मन्त्रों वाले इस सूक्त तथा इससे पहले सूक्त का ऋषि गयः प्लातः है जिसका अर्थ सायणाचार्य महोदय द्वारा प्लति का पुत्र गय किया गया है । मन्त्र संख्या १२, १६ व १७ त्रिष्टुप् छन्द में हैं, शेष मन्त्र जगती छन्द में हैं । यदि अन्य सूक्तों की भांति विश्लेषण किया जाता है तो सायणाचार्य द्वारा गय को प्लति का पुत्र कहना ठीक ही है । लेकिन डा. अभयदेव का अनुमान है कि गयः प्लातः का अर्थ गयः प्रातः हो सकता है । इस अनुमान की पुष्टि पौराणिक संदर्भों द्वारा होती है जहां गय/गयासुर को सार्वत्रिक रूप से नक्त और द्रुति का पुत्र कहा गया है । नक्त या रात्रि का पुत्र तो प्रातः ही हो सकता है । नक्त को समाधि अवस्था तथा प्रातः को समाधि से व्युत्थान की अवस्था, सामान्य जीवन में जीने की अवस्था लिया जा सकता है । केवल समाधि अवस्था में जाना ही पर्याप्त नहीं है । सामान्य जीवन उससे किस प्रकार रूपान्तरित होता है, यह महत्त्वपूर्ण है । यही इस ऋषि के सूक्तों का प्रतिपाद्य विषय होना चाहिए, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है ।

          मन्त्र के अर्थ को समझने में सायण भाष्य से सहायता मिलती है । ऋषि कह रहा है कि शृण्वतां - जो सुनने वाले देवगण हैं, उनका सुमन्तु नाम किस प्रकार उच्चारण करें(मनामहे) । वह नाम किस याम में होना चाहिए । याम का अर्थ सायण द्वारा यज्ञ किया गया है (यान्ति गच्छन्त्यत्रेति यामा यज्ञ: ) । मन्त्र की दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि कौन सा देव है जो मुझे प्रसन्नता देता है, कृपा करता है (मृळाति), कौन सा देव है जो हमारे लिए सुखकारी है (मयस्करत् ) तथा कौन सा देव है जो हमारी रक्षा के लिए आता है (अभ्याववर्तति ) ।

          चूंकि पहले मन्त्र में केवल प्रश्न ही उठाए गए हैं, अतः उनके उत्तर इससे आगे के मन्त्रों में मिलने चाहिएं । दूसरा मन्त्र है -

क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेना: पतयन्त्या दिशः ।

न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषn मे अधि कामा अयंसत ।।

सायणाचार्य के अनुसार इसका अर्थ होगा कि हृदयों में जो धीतियां(?) हैं, वह क्रतु/यज्ञ करने की इच्छा करती हैं । जो वेन हैं, वे वेनन करते हैं तथा सब दिशाओं से गिरते हैं । इनके सिवाय हमें प्रसन्नता देने वाला कोई देव नहीं है । देवों में मेरी सारी कामनाएं निहित हो गई हैं । डा. अभयदेव ने इंगित किया है कि इस मन्त्र के अनुसार जो क्रतु हैं, वह स्वयं क्रतु करने वाले बन गए हैं, वैसे ही जैसे प्रसिद्ध पुरुष सूक्त में यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: इत्यादि । अर्थात् यज्ञ से यज्ञ का यजन हो रहा है, क्रतु में से नए क्रतु का जन्म हो रहा है । वेनन्ति वेना: का अर्थ सायण भाष्य में कान्ता: प्रज्ञा: किया गया है जो देवों की कामना करती हैं । पतयन्ति आ दिशः का अर्थ इस प्रकार किया गया है कि दिशः, हमारे द्वारा निर्दिष्ट कामनाएं फल प्राप्ति के लिए देवों तक पहुंचती हैं । लेकिन यह अर्थ मन्त्र की खींचतान प्रतीत होता है । वेन का ठीक अर्थ तब लगाया जा सकता है जब वेन को वेर्न/वे: न, पक्षी की भांति माना जाए । ऐसा कहा जा सकता है कि वेर्न का परोक्ष रूप वेन है । ऐसा मानने पर मन्त्र का अर्थ होगा कि पक्षी उड रहे हैं और सब दिशाओं से नीचे आते हैं । यह पक्षी हमारे विचार आदि हो सकते हैं । आदर्श स्थिति यह होगी कि हमारे विचार हमारे नियन्त्रण में रहें । लेकिन सामान्य रूप से ऐसा होता नहीं है । एक बार कोई विचार उत्पन्न हुआ कि फिर हमसे दूर - दूर ही चला जाता है । मन्त्र के अनुसार वह विचार हमारे पास लौटकर आना चाहिए । वेर्न/वेन को विचार के बदले मन भी माना जा सकता है जिस पर हमारा नियन्त्रण नहीं है ।

अन्यसंदर्भाः

पाद

१. का ऊरू पादा उच्येते (पुरुषस्य) ? पद्भ्यां शूद्रो अजायत । काठसंक १०१:३ ।।

२. केनेत्या इति, पादाभ्यामिति । शांआ ३, ; कौउ १, ७ ।।

३. त्रयो अस्य पादा इति, त्रीणि सवनानि । काठसंक २५ : १-२ ।।

४. दिशः पादाः । तैसं ७, , २५, १। ।

५. पद्भ्यां ( पुरुषस्य ) भूमिः ( समवर्तत )। काठसं १०१ : ९; तैआ ३, १२,६ ।

६. पादावेवास्य समिष्टयजुः । माश ११, , , ९।।

७. प्रतिष्ठा वा एकविंश स्तोमानां , पद्भ्यामेव तेन पाप्मानमपघ्नते । जै २,१३५ ।

८. प्रतिष्ठा वै पादः । माश १३, , , ८ ॥

स (प्रजापतिः) पद्भ्यामेव प्रतिष्ठाया एकविंशं स्तोममसृजत्। जै १.६९

गतिरिव पादयोः तैआ ९.१०.२, तैउ ३.१०.२

अश्विनोः पादाभ्यां (ब्रह्मौदनं प्राश्नामि) शौअ ११.३.४६

अपादाशो मनः तैब्रा ३.१०.८.३

त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषत्

 

The question what may be the meaning of one step, two steps, three steps, four steps and fifth steps in vedic literature was raised during a veda workshop at Veda Samsthan, New Delhi, on 6-7-2009 on a vedic mantra. The mantra, roughly, states that one step being, when it becomes plenty, may be get converted into two step being, two step being may be transformed into three step being. Then, the four step being may get converted into two step being if refining is done. The aim is to reach the fifth stage. Dr. Abhaya Dev pointed out what may be the meaning of refining and the fifth state. He said that refining in the mantra indicates how the gross nature of our lower self can be shed to reach finer stages. Then the four stepped animal may get converted into two stepped animal(a man). A four stepped animal moves in horizontal direction only. But a two stepped animal, man , can move both horizontally and vertically. This is the difference. But there is a fifth stage, which has to be kept in mind. And this fifth stage is free from all the grossness of nature.

          It will be important to know in what context this mantra has been stated in Rigveda. The intent of the seer is expressed in the first mantra of the hymn. The first mantra states that if one remains hungry, its pain is severe than dying. If one eats, he is also sure to die. One can propitiate the kundalini? power, but this is not going to lead to ultimate happiness. What is ultimate happiness? The name of the seer is a beggar. According to Sanskrit language, it can be guessed that beggar is the first stage. If we modify the word, it will lead to the second stage a physician. What can be a physician for our consciousness ? Our higher selves are the physicians for the lower selves. Then the second step will automatically be generated from the first step. . Let this stage be achieved and this will be the ultimate happiness.

A verse of Rigveda indicates that two steps by a man may indicate the chain of cause and effect. By effort, it is possible to reverse the order.

First published : 15-7-2009 AD (Shraavana krishna ashtami, Vikram samvat 2066); modified 8-6-2010