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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Paksha to Pitara  )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Paksha - Panchami  ( words like Paksha / side, Pakshee / Pakshi / bird, Panchachuudaa, Panchajana, Panchanada, Panchamee / Panchami / 5th day etc. )

Panchamudraa - Patanga ( Pancharaatra, Panchashikha, Panchaagni, Panchaala, Patanga etc. )

Patanjali - Pada ( Patanjali, Pataakaa / flag, Pati / husband, Pativrataa / chaste woman, Patnee / Patni / wife, Patnivrataa / chaste man, Patra / leaf, Pada / level etc.)

Padma - Padmabhuu (  Padma / lotus, Padmanaabha etc.)

Padmamaalini - Pannaga ( Padmaraaga, Padmaa, Padmaavati, Padminee / Padmini, Panasa etc. )

Pannama - Parashunaabha  ( Pampaa, Payah / juice, Para, Paramaartha, Parameshthi, Parashu etc. )

Parashuraama - Paraashara( Parashuraama, Paraa / higher, Paraavasu, Paraashara etc)

Parikampa - Parnaashaa  ( Parigha, Parimala, Parivaha, Pareekshita / Parikshita, Parjanya, Parna / leaf, Parnaashaa etc.)

Parnini - Pallava (  Parva / junctions, Parvata / mountain, Palaasha etc.)

Palli - Pashchima (Pavana / air, Pavamaana, Pavitra / pious, Pashu / animal, Pashupati, Pashupaala etc.)

Pahlava - Paatha (Pahlava, Paaka, Paakashaasana, Paakhanda, Paanchajanya, Paanchaala, Paatala, Paataliputra, Paatha etc.)

Paani - Paatra  (Paani / hand, Paanini, Paandava, Paandu, Pandura, Paandya, Paataala, Paataalaketu, Paatra / vessel etc. )

Paada - Paapa (Paada / foot / step, Paadukaa / sandals, Paapa / sin etc. )

 Paayasa - Paarvati ( Paara, Paarada / mercury, Paaramitaa, Paaraavata, Paarijaata, Paariyaatra, Paarvati / Parvati etc.)

Paarshva - Paasha (  Paarshnigraha, Paalaka, Paavaka / fire, Paasha / trap etc.)

Paashupata - Pichindila ( Paashupata, Paashaana / stone, Pinga, Pingala, Pingalaa, Pingaaksha etc.)

Pichu - Pitara ( Pinda, Pindaaraka, Pitara / manes etc. )

 

 

पिण्ड

टिप्पणी : पिण्ड निर्माण की सरल व्याख्या यह हो सकती है कि प्रेत के पाप रूपी अन्न को पीस देना है और उसमें अपने पुण्यों का जल मिलाकर  उससे पिण्ड बनाकर उसे प्रेत को अर्पित करना है। वराहोपनिषद का कथन है कि पिण्ड नाडियों का आश्रय स्थान है, नाडियां प्राण का, प्राण जीव का, जीव हंस का (नाडीनामाश्रयः पिण्डो नाड्यः प्राणस्य चाश्रयः। जीवस्य निलयः प्राणो जीवो हंसस्य चाश्रयः। हंसः शक्तेरधिष्ठानं चराचरमिदं जगत्। - वराहोपनिषद ५.५४)। गर्भ में भी पिण्ड का विकास इसी क्रम से होता है। फिर साधना के द्वारा जिस पिण्ड को बनाया जाना है, उसमें और गर्भ के पिण्ड में क्या अन्तर होगा। इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि पिण्ड को ऐसा बनाना है जो चेतना को अन्तर्मुखी बना सके। वैदिक शब्दों में इसे अन्तस्थ और ऊष्माण कह सकते हैं। संसार में प्रायः सभी क्रियाएं ऊष्मा उत्पन्न करती है। ऐसी बहुत कम क्रियाएं हैं जो अन्तस्थ हों, जिनमें शीतलता उत्पन्न हो।

     पुण्यों का जल किस प्रकार का हो सकता है, इस विषय में ब्रह्माण्ड पुराण के इस कथन को उद्धृत किया जा सकता है कि प्रजापति ने इस सृष्टि में पांच रूपों में प्रवेश किया – स्थावरों में विपर्यास के रूप में, तिर्यकों में शक्ति के रूप में, मनुष्यों में सिद्धि के रूप में, इत्यादि। अतः पिसे हुए कण की सममिति को पूरा करना जल मिलाने के तुल्य है।

प्रेतकार्य के अन्त में पठनीय मन्त्र निम्नलिखित है -

अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः।

अक्षयः पुण्डरीकाक्षः प्रेतमोक्षप्रदो भव।। - गरुड पुराण २.४.११८

इस मन्त्र में पुण्डरीकाक्ष का आह्वान प्रयोजनमूलक है। पिण्ड और पुण्ड/ पुण्डरीक में एक सम्बन्ध है।

पिण्ड शब्द पिडी - सहभावे, संघाते धातु से बना है । आज के ठोस अवस्था भौतिकी के युग में पिण्ड के सहभाव को समझना अधिक सरल है । जब अणु किसी ठोस पदार्थ का निर्माण करने के लिए पास - पास आते हैं तो अणुओं के बाहर गतिशील इलेक्ट्रान परस्पर मिल कर पट्टों का निर्माण करते हैं । इन पट्टों में इलेक्ट्रान अधिक स्वतन्त्रता से गति कर सकते हैं । इस धारणा के समानान्तर, मिथक में शिव पुराण का कथन है कि पिण्ड के निर्माण से व्यक्ति/व्यष्टि से समष्टि/जाति भाव में रूपान्तरण होता है । व्यष्टि में द्यूत, प्रकृति में चांस विद्यमान रहता है । समष्टि या जाति भाव में प्रवेश करने पर यह चांस बहुत कम रह जाता है । सब घटनाएं व्यवस्थित हो जाती हैं ।

दैनिक जीवन में प्रतिदिन रोटी बनाते समय भी आटे का पिण्ड बनाया जाता है और पिण्ड के संदर्भ में जो कुछ भी कहा गया है, वह रोटी के विषय में भी सोचा जा सकता है।

   नीचे जो चित्र दिया गया है, वह मृत्यु-पश्चात् दशम दिवस पर प्रेत हेतु देय पिण्डदान का चित्र है। दायीं ओर जो दस पिण्ड रखे हुए हैं, वह मलिन षोडशी(मृत्यु-पश्चात् प्रथम दस दिन) के दस दिनों में देय दश पिण्ड हैं। इन पिण्डों से प्रेत के शिर आदि देह के अंगों का क्रमिक रूप से निर्माण होता है। प्रथम पिण्ड प्रेतशिरःपूरक, दूसरा कर्णाक्षिनासिकापूरक, तीसरा गलांसभुजवक्षःपूरक, चौथा नाभिलिङ्गगुदपूरक, पांचवां जानुजङ्घापाद पूरक, छठां सर्वमर्मपूरक, सातवां सर्वनाडीपूरक, आठवां दन्तलोमादिपूरक, नवां वीर्यरजःपूरक है। अन्तिम दसवें पिण्ड से उसकी क्षुधा की शान्ति होती है(पूर्णतातृप्तताक्षुद्विपर्ययपूरक), ऐसा गरुड पुराण में कहा गया है। मलिन षोडशी के इन दशगात्रसंज्ञक पिण्डों से पहले छह या सात पिण्ड और दिए जाते हैं। पहला पिण्ड मृति स्थान पर दिया जाता है। दूसरे पिण्ड की संज्ञा पान्थ है जिसे शव के निर्गम द्वार पर दिया जाता है। तीसरे पिण्ड की संज्ञा खेचर है जिसे चतुष्पथ पर दिया जाता है। चौथे पिण्ड की संज्ञा भूत है जिसे ग्राम और श्मशान के मध्य विश्राम स्थल पर दिया जाता है। यह देह की आहवनीय योग्यता का सूचक कहा गया है। पांचवें पिण्ड की संज्ञा वायु है जिसे भाव सम्पादक, यक्षराक्षसपिशाचादि तुष्ट्यर्थ कहा गया है। छठें पिण्ड की संज्ञा साधक है जिसे चिता में शवहस्त पर दिया जाता है। सातवां(छठां) पिण्ड अस्थिसञ्चयन से पूर्व दिया जाता है। चित्र में इन छह/सात पिण्डों को नहीं दिखाया गया है।  बांयीं ओर जो १६ पिण्ड रखे हैं, वह अगली षोडशी, जिसे उत्तम षोडशी कहते हैं, में देय पिण्डों के प्रतीक हैं(मलिन षोडशी और उत्तम षोडशी के बीच एक मध्यम षोडशी करने का भी विधान है जिसका वर्णन यहां नहीं किया जा रहा है)। १६ पिण्डों के संदर्भ में गरुड पुराण प्रेतखण्ड ५.९५ व १५.८२ का निम्नलिखित श्लोक प्रमाण माना जाता है –

याम्यं सौरिपुरं नगेन्द्रभवनं गन्धर्व्वशैलागमौ। क्रौञ्चं क्रूरपुरं विचित्रभवनं बह्वापदं दुःखदम्॥ नानाक्रन्दपुरं सुतप्तभवनं रौद्रं पयोवर्षणं। शीताढ्यं बहुधर्म्मभीतिभवनं याम्यं पुरं चाग्रतः॥

उपरोक्त श्लोक में यमपुरी से पहले १६ पुरों का उल्लेख है जिसके लिए १६ मासिक श्राद्धों में निम्न कथनानुसार संकल्प किया जाता है –

अद्या ऽमुक गोत्रस्यामुक नामक प्रेतस्य प्रेतत्व विमुक्तये ऽभीष्टलोकावाप्तये षोडशाह श्राद्धान्तर्गत आद्य श्राद्धादारभ्य द्वादश मासिक श्राद्धपर्यन्तम् निर्विघ्नता पूर्वकाऽक्षय स्वर्ग लोक गमनकामनया आद्य श्राद्धे याम्यपुरे प्राप्त्यर्थं एष पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। (१)

अद्या० प्रथममासिकश्राद्धे याम्यपुरात् सौरिपुर नगरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते मया०॥(२)

अद्या० त्रिपाक्षिक श्राद्धे सौरीपुरात् वरेन्द्रपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०(३)

अद्या० द्वितीयमासिकश्राद्धे वरेन्द्रपुरात् गन्धर्वपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥(४)

अद्या० तृतीयमासिकश्राद्धे गन्धर्वनगरात् शैलागमनपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥(५)

अद्या० चतुर्थमासिकश्राद्धे शैलागमनपुरात् क्रौञ्चपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥ (६)

अद्या० पञ्चममासिकश्राद्धे क्रौञ्चपुरात् क्रूरपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥ (७)

अद्या० ऊनषाण्मासिक श्राद्धे क्रूरपुरात् विचित्रपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते० (८)

(सव्य यज्ञोपवती होकर नौका संकल्प। पुनः अपसव्य होकर पिण्डदान संकल्प)

अद्या० षष्ठममासिक श्राद्धे विचित्रनगरात् बह्वापदपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते० (९)

अद्या० सप्तममासिक श्राद्धे बह्वापदनगरात् दुःखदपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥(१०)

अद्या० अष्टममासिक श्राद्धे दुःखदनगरात् नाना क्रन्दनपुर पर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥(११)

अद्या० नवममासिक श्राद्धे नानाक्रन्दननगरात् सुतप्तपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते० (१२)

अद्या० दशममासिक श्राद्धे सुतप्तनगरात् रौद्रपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥ (१३)

अद्या० एकादशमासिक श्राद्धे रौद्रनगरात् पयोवर्षणपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥ (१४)

अद्या० ऊनाब्दिकमासिक श्राद्धे पयोवर्षणनगरात् शीताढ्यपुरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते०॥ (१५)

अद्याऽमुक गोत्रस्य अमुकनाम प्रेतस्य द्वादशमासिक श्राद्धे शीताढ्यनगरात् धर्मपुरनगरपर्यन्तम् एष पिण्डस्ते मया दीयते०॥(१६)

अद्यामुक गोत्रस्य अमुकनाम० अधिकमास निमित्तकपिण्डोऽयम् ते मया दीयते तवोपतिष्ठन्ताम्॥(१७)

अन्तिम १७/१८वां पिण्ड यम के लिए है।

 (पिण्डों का उक्त विवरण एकादशादि सपिण्डी(सम्पादक पण्डित रामस्वरूप शर्मा, प्रकाशक : श्री भगवत बुक डिपो, पुरानी तहसील, मेरठ शहर) से लिया गया है। सामान्य रूप से यह ज्ञात नहीं हो पाता है कि मासिक पिण्डदान से किस उद्देश्य की सिद्धि होती है। उपरोक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है।

     यह संदेह होना स्वाभाविक है कि मृत्यु के पश्चात् पिण्डदान से मृत व्यक्ति को क्या लाभ मिलने वाला है। इसका उत्तर श्मशान शब्द की टिप्पणी में पहले ही दिया जा चुका है जिसकी पुनरुक्ति करना यहां उचित होगा। यदि मृत व्यक्ति ने मृत्यु से पूर्व अपनी देह से सारी चेतना निकाल ली है तो उसके लिए पिण्डदान करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि ऐसा नहीं हो पाया है, शरीर से चेतना को निकालते समय शरीर से प्राणों का शोषण पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है तो इस कार्य को मृत्यु-पश्चात् क्रियाओं के द्वारा पूर्ण किया जाता है जिससे कि मृत व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में जो अनुभव प्राप्त किए हैं, वह उसके साथ जाएं, नए जीवन में उसे उन्हीं अनुभवों का पुनः संचय न करना पडे। मृत्यु-पश्चात् प्रेत के लिए जिस-जिस प्रकार की देह की आवश्यकता होगी, संस्कार करने वाले पुत्रादि को उसी के अनुसार अपने पिण्ड का निर्माण करना पडेगा। यव, व्रीहि आदि से पिण्ड का निर्माण तो केवल नाटक मात्र है, वास्तविक पिण्ड का निर्माण तो अपनी ही चेतना द्वारा किया जाना है, जैसा कि उपनिषदों में स्पष्ट किया गया है।

चित्र में सबसे नीचे दांयी ओर तीन दीपों की ज्योतियों को परस्पर मिलाकर रखा गया है।

     वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से पिण्डपितृयज्ञ की क्रियाविधि प्राप्त होती है ( उदाहरणार्थ, आश्वलायन श्रौत सूत्र २.७.१३, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १.२१.१ आदि ) । पितरों हेतु पिण्ड निर्वाप के लिए पहले धान्य का वितुषीकरण व पेषण किया जाता है और उसके पश्चात् उसमें जल आदि मिलाकर उसे पिण्ड का रूप दिया जाता है । यदि पितरों हेतु पिण्ड का निर्माण करना हो तो इसी अवस्था में पिण्डदान किया जाता है । यदि इस पिण्ड से देवों को हवि प्रदान करने के लिए पुरोडाश का निर्माण करना हो तो इस पिण्ड को अंगार की अग्नि से पकाया जाता है । पितरों हेतु प्रायः तीन पिण्डों के निर्माण का निर्देश है - पहला वसु रूप पितरों के लिए, दूसरा रुद्र रूप पितामहों के लिए और तीसरा आदित्य रूप प्रपितामहों के लिए (वसून्‌ वदन्ति च पितॄन्‌ रुद्रांश्चैव पितामहान्। प्रपितामहांस्तथादित्यानित्येवं वैदिकी श्रुतिः।। - मत्स्य पुराण १९.३)। कहा गया है कि पितर निर्वाप के पश्चात् मध्यम पिण्ड का प्राशन पत्नी कर ले जिससे वह पितरों की कृपा से कुमार को जन्म देती है ( आधत्त पितरों गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् । यथाऽयमरपा असदिति - पितर मुझमें पुष्कर माला वाले कुमार को गर्भ रूप से धारण कराएं ) । अथवा महारोग से तप्त इस पिण्ड का प्राशन करे । शेष दो पिण्डों को आपः में या अतिप्रणीत नामक अग्नि में प्रक्षिप्त करने का निर्देश है । लेकिन ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार कामना अनुसार पिण्ड का दान करना होता है । भोगार्थी अग्नि में, उत्तम कान्ति के लिए गौ को, प्रज्ञा, यश, कीर्ति के लिए आपः में, दीर्घायु के लिए वायसों को, सौकुमार्यत्व के लिए कुक्कुट को । स्कन्द पुराण ६.२७० में चतुर्विंशति तत्त्वों से निर्मित पिण्ड का कथन है और अपने पापों का अपनयन करने के लिए पापपिण्ड रूपी सुवर्ण मूर्ति का ब्राह्मण को दान करना होता है जिससे स्वयं की पाप से मुक्ति हो जाती है । २४ तत्त्वों के रूप में पृथिवी आदि ५ महाभूत, प्राण, जिह्वा, चक्षु, त्वक्, श्रोत्र, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार गिनाएं गए हैं । २५ वां क्षेत्रात्मन् तथा २६ वां परमात्मन् है । पुराणों में पञ्चपिण्डात्मिका गौरी के सृजन के वर्णन से यह प्रतीत होता है कि आरम्भ में यह आवश्यक नहीं है कि २४ तत्त्वों से ही पिण्ड का निर्माण किया जाए । कम तत्त्वों से भी काम चल सकता है ।

     पिण्डों के अग्नि में प्रक्षेप के संदर्भ में, ऋग्वेद १.१६२.१९, वाजसनेयि संहिता २५.४२ आदि  में कहा गया है कि 'या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ता ता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ ' अर्थात् गात्रों में जिन - जिन को ऋतुथा बना लिया जाता है, उन्हीं का अग्नि में होम किया जाता है । ऋतुथा बनाने का अर्थ होगा कि उन्हें संवत्सर से एकाकार करना । शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.११, ७.३.१.३५ आदि में उखा नामक पात्र में सिकता रूपी रेतः सिंचन का वर्णन किया गया है । उखा योनि का कार्य करती है जिससे संवत्सर रूपी वैश्वानर अग्नि का जन्म होता है ? स्वयं सिकता भी वैश्वानर अग्नि का रेतः है । सिंचित सिकता रूपी रेतः को संवत्सर के अहोरात्र आदि अवयवों से एकाकार कैसे करना है, यह इस संदर्भ में वर्णित है । यद्यपि इस संदर्भ में सिकता के साथ पिण्ड शब्द प्रकट नहीं हुआ है, लेकिन गया में पिण्डदान की एक प्रक्रिया के संदर्भ में यह कथन महत्त्वपूर्ण हो जाता है । गया में पितरों हेतु पिण्डदान विधि में सर्वप्रथम फल्गु नदी के पश्चिमी तट पर स्थित विष्णुपद पर पिण्डदान आदि किया जाता है और उसके पश्चात् पूर्वी तट पर सीताकुण्ड पर पिण्डदान किया जाता है । विष्णुपद पर पिण्डों का निर्माण व्रीहि व यव चूर्ण द्वारा किया जाता है(शतपथ ब्राह्मण ५.५.५.९ के अनुसार तीन पिण्डों हेतु द्रव्य क्रमशः व्रीहि, यव तथा व्रीहि हैं ) जबकि सीताकुण्ड पर बालुका के तीन पिण्डों का निर्माण किया जाता है । इसके पीछे कथा यह है कि वनवास के समय राम व लक्ष्मण कहीं गए हुए थे तो उनके पिता दशरथ ने प्रकट होकर सीता से पिण्ड की कामना की । सीता ने अपनी असमर्थता प्रकट की कि इस समय उसके पास पिण्ड निर्माण हेतु कोई भी वस्तु नहीं है, लेकिन दशरथ ने कहा कि बालुका से ही पिण्ड बनाकर वह अर्पित कर दे । सीता ने ऐसा ही किया और पिण्ड दशरथ के हाथों पर रख दिए। जब राम व लक्ष्मण लौट कर आए तो उनको पिण्ड दान का पता लगा । उन्हें विश्वास नहीं हुआ और पुष्टि के लिए उन्होंने फल्गु नदी, केतकी आदि से सत्य का पता लगाना चाहा । उन्होंने झूठ बोल दिया कि सीता ने पिण्डदान नहीं किया । सीता ने फल्गु को शाप दिया कि तुम्हारा जल अन्तर्मुखी हो जाए । इसी प्रकार केतकी पुष्प को भी शाप दिया कि तुम पूजा के अयोग्य हो जाओ । फिर वट वृक्ष से पूछने की बारी आई । उसने सत्य बता दिया । इस पर सीता ने वट वृक्ष को अक्षय वट बन कर कामना पूर्ति करने का वरदान दिया । इस आख्यान का निहितार्थ यह हो सकता है कि सीता की साधना के स्तर पर पिण्डदान का प्रभाव फल्गु नदी व केतकी पुष्प रूपी साधना के स्तरों पर नहीं पडता है । अतः उन्हें पता नहीं है कि सीता ने पिण्ड दान दिया है या नहीं । वैदिक दृष्टिकोण से सीता उखा का प्रतीक हो सकता है । वैदिक साहित्य में हल द्वारा भूमि को जोतने से बनी रेखाओं को सीता कहा जाता है । इन सीताओं में उर्वरा शक्ति निहित रहती है जिससे इनमें बीज के वपन से वह अंकुरित हो जाता है । फल्गु नदी की साधना कर्मफल को केवल निष्फल, व्यर्थ बनाने की है, बीज को भूनने की है। बीज को जब भून दिया जाता है, तब वह अंकुरित नहीं हो पाता। साधना का इससे भी अगला स्तर वह है जहां अच्छे बीजों को अंकुरित किया जा सके।

     सिकता के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण ६.१.३.१ का यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि पहले प्रजापति के तप से उत्पन्न स्वेद से आपः उत्पन्न हुआ । उसके मथन से फेन, फेन से मृद, मृद से सिकता, सिकता से शर्करा, शर्करा से अश्मा, अश्मा से अयः और अयः से हिरण्य । शतपथ ब्राह्मण ३.५.१.३६ आदि का कथन है कि सिकता अग्नि की भस्म रूप है जिसमें अग्नि छिपी रहती है । सिकता अलंकार रूप भी है । शतपथ ब्राह्मण ७.३.१.३८ का कथन है कि सिकता के शुक्ल व कृष्ण दो रूप हैं जो अहोरात्र के प्रतीक हैं । इस आधार पर प्रतीत होता है कि सिकता या बालू साधना में प्रकट कोई बिखरी हुई ज्योति है जिसको एकत्रित करके पिण्ड का रूप देना है । फिर सिकता के स्तर को क्रमशः पार करते हुए हिरण्य के स्तर तक पहुंचना है । शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.११ का कथन है कि यातयाम ( जो बेकार हो गई है ) अग्नि की भस्म है और अयातयाम( जो बेकार नहीं हुई है ) सिकता ।

 प्रथम लेखन : २६-१२-२००७ई., अंतिम संशोधन : -१०-२०१ई.(कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा, विक्रम संवत् २०७१)

It is a common religious practice to form a lump of cereal powder for offering to manes. It is much easier to understand the significance of of a lump in this age of solid state physics. A solid is formed out of a combination of molecules. When the molecules come closer to each other, their outermost electrons combine to form energy bands. An electron has more freedom for movement when it is a part of the solid than when it was associated with a single molecule. In other words, until it is associated with a single molecule, it behaves in a chance manner. When it is part of a solid, it is much easier to predict it’s behaviour. The same thing can be said about consciousness also.

            Vedic literature universally describes the process for preparation of a cereal lump. First, the cereal is de – husked and then water etc. are added to it. If the lump has to be offered to manes, then it is offered in raw form. If it has to be offered to gods, then it is baked on fire. Generally, three lumps are offered to manes. The middle lump is supposed to be eaten by wife so that she may bear a child having flower garland on his neck. Other lumps have to be either thrown in water or fire or offered to cow or crow or cock, depending on the type of desire. There are instructions to offer a lump of one’s own sins by which one gets emancipation.

            It is not enough to offer a lump only. This lump has to be identified with different parts of a year – day and night, month etc.

When this lump is established in a proper womb, it gives rise to a baby. There is a story about offering of lump to manes at Gayaa. Once, Raama and Lakshmana were absent and in the meanwhile late king Dasharatha appeared before Seetaa and asked for lump . On hearing that no offer can be made when there is nothing in the house, Dasharatha asked Seetaa  to offer lumps of sand itself. And to surprise, Dasharatha was satisfied. When Raama and Lakshmana came back, they got to know that Seetaa has offered lumps to Dasharatha. To confirm, they asked the truth from the river Falgu at Gayaa and also from flower Ketaki. Both denied any knowledge of offering of lump. Seetaa cursed these two. Then Raama asked from Vata tree. The tree told that it is true. Seetaa gave Vata tree a boon that it always remain immortal. . In vedic literature, Seetaa is treated as the line made by a plough in a field. If some seed is sown in this line, it will sprout. In other words, Seetaa has the power to successfully give birth to life when seed is put inside it. This life form is the actual lump. It is important to note that in vedic rituals, sand is established inside a sacrificial vessel called Ukhaa where it works as a semen and Ukhaa works as a womb to grow it and gives birth to a particular fire. Complete growth inside womb is supposed to take place in a year’s time. The question is what sand may signify in spirituality? It has been stated in vedic literature that sand appears white and black which is symbolic of day and night. Thus sand may be a state of light in meditation which appears scattered like sand. This light has to be collected as a lump. One vedic text states that the first stage during penance is appearance of something like sweat. Then bubbles appear in this sweat. Bubbles give rise to soil, soil to sand, sand to pebbles, pebbles to iron, iron to gold. Then appears a baby.

 

संदर्भ :

*एक॒स्त्वष्टु॒रश्व॑स्या विश॒स्ता द्वा य॒न्तारा॑ भवत॒स्तथ॑ ऋ॒तुः। या ते॒ गात्रा॑णामृतु॒था कृ॒णोमि॒ ताता॒ पिण्डा॑नां॒ प्र जु॑होम्य॒ग्नौ॥ - ऋ. १.१६२.१९

दीप्त(त्वष्टुः) अश्व की देह को काटने वाला एक ही है(कालात्मा?)। दो नियमन करने वाले हैं(अहोरात्र या द्यावापृथिवी) - - -ऋतु? । हे अश्व, तेरे शरीर के जिन-जिन अंगों को मैं ऋतु-अनुकूल बना देता हूं, उन-उन पिण्डों की अग्नि में आहुति देता हूं।

*पिण्डपितृयज्ञे पिण्डान् पिण्डपात्रे प्रत्यवधाय अवजिघ्रणम् – अथावजिघ्रति प्रत्यवधाय पिण्डान्। स यजमानभागः। - मा.श. २.४.२.२४  

*राजसूये त्रैधातवीसंज्ञिका उदवसानीयेष्टिः : व्रीहिमयमेवाग्रे पिण्डमधिश्रयति – तद् यजुषां रूपम्। अथ यवमयं – तदृचां रूपम्। अथ व्रीहिमयं – तत् साम्नां रूपम्। तदेतत्त्रय्यै विद्यायै रूपं क्रियते। - मा.श. ५.५.५.९

*अथ मृत्पिण्डमभिमृशति। “पुरीष्योऽसि” इति। पशव्योऽसीत्येतत्। विश्वंभराः इति। एष हीदं सर्वं बिभर्त्ति। अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने इति। प्राणो वाऽथर्वा, प्राणो वाऽएतमग्रे निरमन्थत्। - - -अथैनं परिगृह्णाति – अभ्र्या च, दक्षिणतो हस्तेन च। - - -त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत इति। - मा.श. ६.४.२.१

*उखाकरणम् -- अथ मृत्पिण्डमपादत्ते। यावन्तं निधयेऽलं मन्यते – मखस्य शिरोऽसि इति। यज्ञो वै मखः। तस्यैतच्छिरः। - मा.श. ६.५.२.१

*महावीरादिप्रवर्ग्यपात्रसंभरणब्राह्मणम् – अथ मृत्पिण्डं परिगृह्णाति। अभ्र्या च दक्षिणतो हस्तेन च। हस्तैनैवोत्तरतः। देवी द्यावापृथिवी इति।…यन्मृदियं तद्यदापोऽसौ तन्मृदश्चापां च महावीराः कृता भवन्ति (परिगृह्य च तं मृत्पिण्डं उत्तरत आस्तीर्णे कृष्णाजिने निदधाति – सायण भाष्य) – मा.श. १४.१.२.९

*अथ मृत्पिण्डमुपादाय महावीरं करोति – मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे इति। - मा.श. १४.१.२.१७

*कूर्च ब्राह्मणम् -- - -स एषोऽन्तर्हृदये आकाशः। अथैनयोरेतदन्नम्। य   एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिंडः। अथैनयोरेतत्प्रावरणम्। यदेतदंतर्हृदये जालकमिव। - -मा.श. १४.६.११.३

*शकृत्पिण्डेभ्यः कूश्मा(अजायत) – जै.ब्रा. २.२६७

*सुकन्या आख्यान -- तं(च्यवनं) कुमारा गोपाला अविपाला मृदा शकृत्पिण्डैर् आसपांसुभिर् अदिहन्। सो ऽसंज्ञां शार्यात्येभ्यो ऽकरोत्।  - जै.ब्रा. ३.१२१

*स हैष प्राणान् संगृह्यावधूय शरीरं प्राणैस् सहोर्ध्व उत्क्रामति। एतेन ह वै प्रत्यूढानि मृत्युश् शरीराणि हरति। तस्यै हैतस्यै देवतायै यथा मृत्पिण्ड इषीके ऽधिहते स्याताम् एवम् एव हृदये पादाव् अधिहतौ। तौ यद् आच्छिनत्य् अथ म्रियते। - जै.ब्रा. ३.३५१

*का ते विद्या का प्रायश्चित्तिरिति। आनडुहेन शकृत्पिण्डेनाग्न्यायतनानि परिलिप्य होम्यमुपसाद्याग्निं निर्मथ्य प्राणापानाभ्यां स्वाहा समानव्यानाभ्यां स्वाहा उदानरूपाभ्यां स्वाहेति जुहुयात् – गोपथ ब्रा. १.३.१३

*देवता ऋषयः सर्वे ब्रह्माणमिदमब्रुवन्। मृतस्य दीयते पिण्डः कथं गृह्णन्त्यचेतसः॥ भिन्ने पञ्चात्मके देहे गते पञ्चसु पञ्चधा। हंसस्त्यक्त्वा गतो देहं कस्मिँस्थाने व्यवस्थितः॥ - -- - - प्रथमेन तु पिण्डेन कलानां तस्य संभवः। द्वितीयेन तु पिण्डेन मांसत्वक्शोणितोद्भवः। तृतीयेन तु पिण्डेन मतिस्तस्याभिजायते। चतुर्थेन तु पिण्डेन अस्थि मज्जा प्रजायते। पञ्चमेन तु पिण्डेन हस्ताङ्गुल्यः शिरो मुखम्। षष्ठेन कृतपिण्डेन हृत्कण्ठं तालु जायते। सप्तमेन तु पिण्डेन दीर्घमायुः प्रजायते। अष्टमेन तु पिण्डेन वाचं पुष्यति वीर्यवान्। नवमेन तु पिण्डेन सर्वेन्द्रियसमाहृतिः। दशमेन तु पिण्डेन भावानां प्लवनं तथा। पिण्डे पिण्डशरीरस्य पिण्डदानेन संभवः। - पिण्डोपनिषद्

*पुरुषश्चाक्षुषो योऽयं दक्षिणेऽक्षिण्यवस्थितः। इन्द्रोऽयमस्य जायेयं सव्ये चाक्षिण्यवस्थिता। समागमस्तयोरेव हृदयान्तर्गते सुषौ। तेजस्तल्लोहितस्यात्र पिण्ड एवोभयोस्तयोः। हृदयादायता तावच्चक्षुष्यस्मिन्प्रतिष्ठिता। - मैत्रायण्युपनिषद ७.११

*अन्तःस्थं मां परित्यज्य बहिष्ठं यस्तु सेवते। हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य लिहेत्कूर्परमात्मनः॥ - जाबालदर्शनोपनिषद ४.५८

*अश्नन्ति यावत्तत्पिण्डं तीर्थनिर्धूतकल्मषाः। तावद्वर्षसहस्राणि तद्दातास्ते शिवे पुरे॥ - शिवोपनिषद ६.१९८

*ऋतुकाले संप्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति सप्तरात्रोषितं बुद्बुदं भवति अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो भवति मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति मासद्वयेन शिरः संपद्यते मासत्रयेण पादप्रदेशो भवति। अथ चतुर्थे मासेऽङ्गुल्यजठरकटिप्रदेशो भवति। पञ्चमे मासे पृष्ठवंशो भवति। षष्ठे मासे मुखनासिकाक्षिश्रोत्राणि भवन्ति। सप्तमे मासे जीवेन संयुक्तो भवति। अष्टमे मासे सर्वसंपूर्णो भवति। पितू रेतोऽतिरिक्तात्पुरुषो भवति मातू रेतोऽतिरिक्तात्स्त्रियो भवन्त्युभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको भवति। - गर्भोपनिषद ३

*पञ्चभूतमयी भूमिः सा चेतनसमन्विता। तत ओषधयोऽन्नं च ततः पिण्डाश्चतुर्विधाः। रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः। केचित्तद्योगतः पिण्डा भूतेभ्यः संभवाः क्वचित्। तस्मिन्नन्नमयः पिण्डो नाभिमण्डलसं  स्थितः। अस्य मध्येऽस्ति हृदयं सनालं पद्मकोशवत्। सत्त्वान्तर्वर्तिनो देवाः कर्त्रहंकारचेतनाः। अस्य बीजं तमःपिण्डं मोहरूपं जडं घनम्। वर्तते कण्ठमाश्रित्य मिश्रीभूतमिदं जगत्। - त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद २.६

*पञ्चात्मकमभूत्पिण्डं धातुबद्धं गुणात्मकम्। सुखदुःखैः समायुक्तं जीवभावनया कुरु। - योगशिखोपनिषद १.८

*यस्य प्राणो विलीनोऽन्तः साधके जीविते सति। पिण्डो न पतितस्तस्य चित्तं दोषैः प्रबाधते। - योगशिखोपनिषद १.६४

*यत्रैव जातं सकलेवरं मनस्तत्रैव लीनं कुरुते स योगात्। स एव मुक्तो निरहंकृतिः सुखी मूढा न जायन्ति हि पिण्डपातिनः॥ - योगशिखोपनिषद १.१२३

*अजरामरपिण्डो यो जीवन्मुक्तः स एव हि। पशुकुक्कुटकीटाद्या मृतिं संप्राप्नुवन्ति वै। तेषां किं पिण्डपातेन मुक्तिर्भवति पद्मज। न बहिः प्राण आयाति पिण्डस्य पतनं कुतः। पिण्डपातेन या मुक्तिः सा मुक्तिर्न तु हन्यते। - योगशिखोपनिषद १.१६१

*नाडीनामाश्रयः पिण्डो नाड्यः प्राणस्य चाश्रयः। जीवस्य निलयः प्राणो जीवो हंसस्य चाश्रयः। हंसः शक्तेरधिष्ठानं चराचरमिदं जगत्। - वराहोपनिषद ५.५४

*पञ्चात्मकमभूत्पिण्डं धातुबद्धं गुणात्मकम्। सुखदुःखैः समायुक्तं जीवभावनया कुरु। - योगतत्त्वोपनिषद १०

*पञ्चबन्धस्वरूपेण पञ्चबन्धा ज्ञानस्वरूपाः। पिण्डाज्जननम्। तज्जननकाले धारणमुच्यते। - लिङ्गोपनिषद

*पञ्चानां त्विति(पञ्चा॒नाम् त्वा॒ वाता॑नां य॒न्त्राय॑ ध॒र्त्राय॑ गृह्णामि पञ्चा॒नां त्व॑र्तू॒नां य॒न्त्राय॑ ध॒र्त्राय॑ गृह्णामि पञ्चा॒नां त्वा॑ दि॒शां य॒न्त्राय॑ ध॒र्त्राय॑ गृह्णामि पञ्चा॒नां त्वा॑ पञ्चज॒नानां॑ य॒न्त्राय॑ ध॒र्त्राय॑ गृह्णामि – तै.सं. १.६.१.२) मन्त्रेण पिण्डानां च चतुर्दश। कुर्यात्संशोध्य किरणैः सौरकैराहरेत्ततः॥ निदध्यादथ पूर्वोक्तपात्रे गोमयपिण्डकान्। स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठाप्याग्निमीजयेत्। पिण्डांश्च निक्षिपेत्तत्र आद्यन्तं प्रणवेन तु। षडक्षरस्य सूक्तस्य व्याकृतस्य तथाक्षरैः। स्वाहान्ते जुहुयात्तत्र वर्णदेवाय पिण्डकान्। - बृहज्जाबालोपनिषद ३.१२

पञ्चानाम् त्वा पृष्ठानाम् धर्त्राय गृह्णामि – मै.सं. १.४.४

पञ्चानाम् त्वा सलिलानाम् धर्त्राय गृह्णामि – मै.सं. १.४.४

*अरण्ये शुष्कगोमयं चूर्णीकृत्यानुसंगृह्य गोमूत्रैः पिण्डीकृत्य यथाकल्पं संस्कृतमुपोपकल्पम्। - बृहज्जाबालोपनिषद ३.३३

*नाशौचं नाग्निकार्यं च न पिण्डं नोदकक्रिया। न कुर्यात्पार्वणादीनि ब्रह्मभूताय भिक्षवे॥ - पैङ्गलोपनिषद ४.६

*अश्रोत्रियं ब्राह्मणं भोजयानस्य षोडश श्राद्धानि पितरो न भुञ्जते। ततो निराशाः पितरो भवन्ति सेन्द्राः स्म देवाः प्रहरन्ति वज्रम्॥ यावतः खलु पिण्डान् स प्राश्नन्ति हविषो नृचः। तावतः शूलान् ग्रसति प्राप्य वैवस्वतं यमम्॥ - इतिहासोपनिषद १३.३

*एकस्मिन्पिण्डे कथं भूतविकारविभाग इति। - - -त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद १.४

*एकेनैव तु पिण्डेन मृत्तिकायाश्च गौतम। विज्ञातं मृण्मयं सर्वं मृदभिन्नं हि कार्यकम्। - पञ्चब्रह्मोपनिषद २९

*दूरस्थोऽपि न दूरस्थः पिण्डवर्जितः पिण्डस्थोऽपि प्रत्यगात्मा सर्वव्यापी भवति। - पैङ्गलोपनिषद ४.९

*तारकाभ्यां सूर्यचन्द्रमण्डलदर्शनं ब्रह्माण्डमिव पिण्डाण्डशिरोमध्यस्थाकाशे रवीन्दुमण्डलद्वितयमस्तीति निश्चित्य - - अद्वयतारकोपनिषद ९

*पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि। स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः॥ - योगकुण्डल्युपनिषद १.८१

*विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः। ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात्॥ स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि। - योगकुण्डल्युपनिषद ३.२२

*पितृयागोक्तविधानेन ब्राह्मणानभ्यर्च्य भुक्त्यन्तं यथाविधि निर्वर्त्य पिण्डप्रदानानि निर्वर्त्य - - नारदपरिव्राजकोपनिषद ४.३८

*स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयं भूय सदात्मना। ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत्॥ - अध्यात्मोपनिषद ८

*उखासम्भरणम् – आहवनीयस्य पुरस्तान्मत्या चतुरस्रे श्वभ्रे मृत्पिण्डमवदधाति भूमिसमम्। पिण्डमपरेण व्यध्वे वल्मीकवपां छिद्रां निदधाति(पिण्डाहवनीययोर्व्यध्वे अर्धपथे)। - - - -अग्निषु ज्वलत्सु पिण्डं गच्छत्यग्निं पुरीष्यमिति। - - वल्मीकवपामादाय छिद्रेण पिण्डमीक्षतेऽन्वग्निरिति। दृष्ट्वा निदधात्येनाम्(वल्मीकवपाम्)। आगत्येत्यभिमन्त्रयतेऽश्वम्। आक्रम्येत्येनेन पिण्डमधिष्ठापयति। द्यौस्त  इति पृष्ठस्योपरि पाणिं धारयन्नुपस्पृशन्। - -  -आहवनीयवत् स्थापयति पिण्डस्य।  - - - अभ्र्या पिण्डं त्रिः परिलिखति परिवाजपतिरिति बहिर्बहिरुत्तरयोत्तरया। अभ्र्या पिण्डं खनति देवस्य त्वेति। - - -पिण्डं पुरीष्योऽसीति। - कात्यायन श्रौत सूत्र १६.२.२-२९

*उत्तिष्ठति पिण्डमादायोदु तिष्ठेति। - - -धारयत्येषामुपरि पिण्डमनुपस्पृशन्प्रैतु वाजी वृषाग्निमित्यश्वखरयोः। - - आपोहिष्ठेति पर्णकषायपक्वमुदकमासिञ्चति पिण्डे। - कात्यायन श्रौत सूत्र १६.३.

*अमावास्यायां पिण्डपितृयज्ञः – यदि बन्धू न विद्यात्स्वधा पितृभ्यः पृथिविषद्भ्य इति प्रथमं पिण्डं दद्यात्। स्वधा पितृभ्यो ऽन्तरिक्षसद्भ्य इति द्वितीयम्। स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भ्य इति तृतीयम्। - - - - वीतोष्मसु पिण्डेषु नमो वः पितरो रसायेति नमस्काराञ्जपति। - - - - अपां त्वौषधीनां रसं प्राशयामि भूतकृतं गर्भं धत्स्वेति मध्यमं पिण्डं पत्न्यै प्रयच्छति। आधत्त पितरो गर्भं(वा.सं. २.३३) कुमारं पुष्करस्रजम्। यथेह पुरुषो ऽसदिति तं पत्नी प्राश्नाति। पुमांसं ह जानुका भवतीति विज्ञायते। ये सजाताः समनसो जीवाजीवेषु मामकाः । तेषां श्रीर्मयि कल्पतामस्मिंल्लोके शतं समा(तैब्रा २.६.३.५) इत्यवशिष्टानामेकं यजमानः प्राश्नाति । न वा स्थाल्यां पिण्डान्समवधाय ये समाना इति (वा.सं. १९.४५)सकृदाच्छिन्नमग्नौ प्रहरति - आप.श्रौ.सू. १.१०.१०

उरसि पितरो भुङ्क्ते वामपार्श्वे पितामहाः। प्रपितामहा दक्षिणतः पृष्ठतः पिण्डतर्कुकाः॥ -