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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Dvesha to Narmadaa )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Dwesha - Dhanavati ( words like Dwesha,  Dvaipaayana, Dhana / wealth, Dhananjaya, Dhanada etc.)

Dhanaayu - Dhara ( Dhanu / bow, Dhanurveda / archery, Dhanusha / bow, Dhanushakoti, Dhanyaa,  Dhanvantari, Dhara etc.)

Dhara - Dharma ( Dharani, Dharaa, Dharma etc.)

Dharma - Dharmadatta ( Dharma, Dharmagupta, Dharmadatta etc.)

Dharmadhwaja - Dhaataa/Vidhaataa ( Dharmadhwaja, Dharmaraaja, Dharmasaavarni, Dharmaangada, Dharmaaranya, Dhaataki, Dhaataa, Dhaaataa - Vidhaataa etc.)

Dhaatu - Dhishanaa ( Dhaataa - Vidhaataa, Dhaatu / metal, Dhaatri, Dhaanya / cereal, Dhaarnaa, Dhaarni, Dhaaraa, Dhishanaa etc.)

Dhishanaa - Dhuupa (Dhee / intellect, Dheeman, Dheera,  Dheevara, Dhundhu, Dhundhumaara, Dhuupa etc.)

Dhuuma - Dhritaraashtra  ( Dhuuma / smoke, Dhuumaketu, Dhuumaavati, Dhuumra, Dhuumralochana, Dhuumraaksha, Dhritaraashtra etc.)

Dhritaraashtra - Dhenu ( Dhriti, Dhrista, Dhenu / cow etc.)

Dhenu - Dhruva ( Dhenu, Dhenuka, Dhaumya, Dhyaana / meditation, Dhruva etc. )

Dhruvakshiti - Nakshatra  ( Dhruvasandhi, Dhwaja / flag, Dhwani / sound, Nakula, Nakta / night, Nakra / crocodile, Nakshatra etc.)

Nakshatra - Nachiketaa ( Nakshatra, Nakha / nail, Nagara / city, Nagna / bare, Nagnajit , Nachiketa etc.)

Nata - Nanda (  Nata, Nataraaja, Nadvalaa, Nadee / river, Nanda etc.)

Nanda - Nandi ( Nanda, Nandana, Nandasaavarni, Nandaa, Nandini, Nandivardhana, Nandi etc.)

Napunsaka - Nara (  Nabha/sky, Nabhaga, Namuchi, Naya, Nara etc. )

Naraka - Nara/Naaraayana (Nara / man, Naraka / hell, Narakaasura, Nara-Naaraayana etc.) 

Naramedha - Narmadaa  (  Naramedha, Naravaahanadutta, Narasimha / Narasinha, Naraantaka, Narishyanta, Narmadaa etc. )

 

 

आरुणकेतुक अग्नि

यथा केदारस्य टिप्पण्यां कथितं भवति, प्रथम चरणं के रूप जलानां दारणं, जडीभूत मेघतः तेषां वर्षणं भवति। यदा दारणंपर्याप्त मात्रायां भवति, तदा तेषां संरक्षणं एवं तेषां सम्यक् उपयोगं अपेक्षितं भवति। अस्य हेतोः आरुणकेतुक अग्निचयनं सम्यक् भवति।

 

आरुणकेतुक उपरि लघु वीडियो

आरुणकेतुक चयनोपरि दीर्घ वीडियो

आरुणकेतुकोपरि श्री केशव अवधानी महोदयस्य व्याख्यानम्

 

 

चित्र 1 आरुणकेतुक अग्नि चयन हेतु जल से पूर्ण कुम्भियों या दीपकों को आरुणकेतुक खर में चयनित किया जा रहा है। बाहर जो श्वेत रंग के करक रखे हुए हैं, उनमें भी जल संचित है। वह सावित्र चयन के प्रतीक हो सकते हैं।

 

 

चित्र 3 उखा पात्र का गार्हपत्य अग्नि, आहवनीय अग्नि व आरुणकेतुक अग्नि पर संस्कार करके उसे आरुणकेतुक अग्नि या आहवनीय अग्नि के समीप उस समय तक रखा गया है जब तक उसे श्येनचिति की प्रथम चिति में स्थापित न कर दिया जाए।

चित्र 4 आरुणकेतुक अग्नि पर यूप की स्थापना?

आरुणकेतुक अग्नि पर उखा का संस्कार पशुबन्ध उत्तरवेदी नामक स्थान पर किया जा रहा है। यूप पशुबन्धन के लिए है। पशुबन्ध उत्तरवेदी की स्थापना प्राग्वंश के समांतर दक्षिण दिशा में की गई है।

चित्र 5 आरुणकेतुक अग्नि की स्थिति

आरुणकेतुक अग्नि की कथा(तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.11.8.1)

बालक नचिकेता का पिता वाजश्रवा यज्ञ में बूढी गायों को ब्राह्मणों को दक्षिणा में दे रहा था। नचिकेता ने देखा कि मेरा पिता सर्वस्व दान कर रहा है। यह देखकर नचिकेता ने अपने पिता से पूछा कि आप क्या आप मुझे भी दक्षिणा में देंगे। पिता ने क्रोधित होकर कहा कि तुम्हें मृत्यु (यम) को दूंगा। बालक ने पिता के शब्दों को अक्षरशः लिया और किसी प्रकार यम के पास पहुंच गया। यम उस समय यमलोक में नहीं था। बालक नचिकेता यमलोक में धरना देकर बैठ गया और तीन दिन भूखा बैठा रहा। यम के आने पर उसका यम से वार्तालाप हुआ। यम ने पूछा कि तुमने पहले दिन क्या खाया। नचिकेता ने कहा तुम्हारी प्रजा। दूसरे दिन क्या खाया। तुम्हारे पशु। तीसरे दिन क्या खाया। तुम्हारे पुण्य। यम ने उसको तीन वरदान दिए। पहला वरदान दिया कि तुम पिता के पास जीवित चले जाओगे। दूसरा वरदान दिया कि तुम्हारा इष्टापूर्त अक्षित हो जाएगा। तीसरा वरदान दिया कि तुम मृत्यु की अपचिति(अपजिति) को जान जाओगे। इस कारण यह अग्नि त्रिणाचिकेत अग्नि भी कहलाती है।

इस कथा को आरुणकेतुक अग्नि से सम्बद्ध किया गया है।

नचिकेता का अर्थ है न चिकेत, जिसको अभी अतीन्द्रिय दर्शन नहीं हुआ है। यम के पास जाने का अर्थ है कि जिसको अभी अतीन्द्रिय दर्शन नहीं हुआ है, उसे यम नियम का पालन करने की आवश्यकता है। धीरे धीरे उसकी अतीन्द्रिय दर्शन की शक्ति विकसित होगी तो वह आरुणकेतुक अग्नि कहलाएगी। दूसरे दिन नचिकेता यम के पशुओं का भक्षण करता है। पशुओं के भक्षण का अर्थ है पशु के पाशों का नाश करना। इस कारण उसको इष्टापूर्त के अक्षित होने का वरदान मिलता है। इष्टापूर्त में इष्ट है वर्षा और पूर्त है वर्षा के जल को तालाब आदि में एकत्र कर लेना जिससे वर्षा न होने के समय संचित जल काम में लिया जा सके। अध्यात्म की भाषा में वर्षा को आनन्द की वर्षा कहा जा सकता है। यह अपेक्षित है कि आनन्द की वर्षा सदैव होती रहे। जिस समय आनन्द की वर्षा नहीं होगी, उसी समय आसुरी भावों का उदय हो जाएगा। इसका उपाय यह किया गया है कि जब आनन्द की वर्षा हो तो उसको संचित कर लो। लेकिन आनन्द की वर्षा के संचय में कठिनाई यह है कि वह जल पात्र में आने के बदले बीच में ही कहीं फंस कर रह जाता है। इन्हें पशु के पाश कहा गया है। अतः यदि वर्षा जल को एकत्र करना हो तो पशु के पाशों को खोलना पडेगा, अथवा नचिकेता की कथा के अनुसार पशु का भक्षण करना पडेगा।

नचिकेता की कथा में तीसरे दिन नचिकेता द्वारा यम के साधुकृत्यों या पुण्यों के भक्षण का उल्लेख है जिससे नचिकेता को वरदान के रूप में मृत्यु की अपचिति का ज्ञान प्राप्त हुआ। पुराणों में जो उल्लेख आते हैं, उनमें पुण्यों को खाया नहीं जाता, अपितु किसी पापी व्यक्ति पर कृपा करके उसको अपने पुण्यों का दान किया जाता है, जैसे दशरथ ने पूर्व जन्म में कलहा को अपने पुण्यों का दान कर दिया जिससे कलहा अगले जन्म में दशरथ की पत्नी कैकेयी बनी। नचिकेता की कथा से संकेत मिलता है कि प्रथम अथवा द्वितीय चरण में अपने पाशों को खोलने का प्रयास करना है। आचार्य रजनीश के शब्दों में, हमने अपने पात्र को उल्टा करके रखा हुआ है जिससे उसमें जल एकत्र ही नहीं हो पाता। वैदिक भाषा में इसे इस प्रकार कहा गया है कि तया देवतया अङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद। इसका अर्थ है कि अपनी देह के प्रत्येक अंग पर उस अंग के देवता विशेष को प्रतिष्ठित होने का अवसर प्रदान करना है। इससे वहां ध्रुवा स्थिति बनेगी। यहां पुरुषार्थ, कर्तृत्व निहित है। नचिकेता की कथा में पुरुषार्थ से अगली स्थिति कृपा की है। व्यावहारिक रूप में, यदि कृपा प्राप्त करनी हो तो हमें अपने से अधिक गुणी व्यक्तियों की सेवा करनी पडेगी। तभी उनकी कृपा प्राप्त हो सकती है। अथवा अपने परितः अपने से गुणी व्यक्तियों का समाज एकत्र करना पडेगा, अपने परितः वृन्दावन का निर्माण करना पडेगा। पुण्यों के भक्षण का परिणाम यह होता है कि नचिकेता यम से मृत्यु की अपचिति जान लेता है। मृत्यु की अपचिति क्या होती है, इसका विस्तार कठोपनिषद में दिया गया है। कहा गया है कि अंगुष्ठ पुरुष को अपनी देह से निकाल कर पहले अव्यक्त में और फिर पुरुष में लीन करना चाहिए। यह ऐसे  अश्वत्थ वृक्ष का निर्माण करने जैसा है जिसकी जडें ऊपर हैं और शाखाएं नीचे। इस कथन के विस्तार रूप में भगवद्गीता में कहा गया है कि पाप के कारण अश्वत्थ वृक्ष की जडें नीचे और शाखाएं ऊपर की ओर हो जाती हैं। इस स्थिति से उबरना है। कहा गया है कि जैसे मुञ्ज से शर या सरकण्डे को अलग किया जाता है, उसी प्रकार आत्मा को(या अङ्गुष्ठ पुरुष को) शरीर से अलग करना है। यहां यह उल्लेखनीय है कि उपनिषद में मुञ्ज से शर को अलग करने की जो उपमा दी गई है, उसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में एण्ट्रांपी या अव्यवस्था को न्यूनतर करना कहा जा सकता है। यह कार्य तभी हो सकता है जब हमारे पास पुण्यों का धन संचित हो। कहा गया है कि इस कार्य में हृदय की ग्रन्थियां बाधक बनती हैं। निद्रा आने पर प्रतिदिन हमारा अङ्गुष्ठ पुरुष शरीर से निकल कर अव्यक्त में लीन होता है और फिर जागने पर अव्यक्त से निकल कर शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार अश्वत्थ बनने की प्रक्रिया प्रतिदिन घटित होती है। लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि अव्यक्त स्थिति को अधिक से अधिक जड स्थिति से चेतन स्थिति तक पहुंचाया जाए जिससे अश्वत्थ वृक्ष की जडें भूमि में होने की अपेक्षा आकाश में रहें। जहां जहां पाप के कारण ग्रन्थियां बंधी हुई हैं, उन्हें समाप्त करके इस प्रक्रिया का शोधन किया जाना चाहिए।

  कर्मकाण्ड में आरुणकेतुक अग्नि का चयन करने के लिए सावित्र चयन किया जाता है, फिर नाचिकेताग्नि चयन, फिर चातुर्होत्र, फिर वैश्वसृज चयन और अन्त में आरुणकेतुक चयन। इन चयनों के बीच में लोकम्पृणा चयन भी किया जाता है।  जैसा कि चित्र 1 में दिखाया गया है। कुम्भियों या कुम्भिकाओं के अभाव में दीपकों में जल भर कर उनका आरुणकेतुक अग्नि के खर में चयन किया जाता है। कर्मकाण्ड में यह कृत्य नचिकेता की कथा के इष्टापूर्त का प्रतीक हो सकता है। कुम्भिकाओं की स्थापना के पश्चात् उस पर पुष्कर पर्ण आदि की स्थापना की जाती है और उसके पश्चात् अग्नि का प्रज्वलन करके उसमें होम किया जाता है। ऐसी व्यवस्था करनी होती है कि अग्नि के कारण नीचे संगृहीत जल को क्षति न पहुंचे।

 अरुण अवस्था सूर्य के उदय होने की स्थिति है। यह अरुण स्थिति पूर्ण उदित सूर्य का रूप धारण कर सकती है। कर्मकाण्ड में आरुणकेतुक अग्नि पर उखा नामक पात्र का संस्कार करके उखा को श्येनचिति के पहले प्रस्तार में स्थापित कर दिया जाता है। उसके ऊपर श्येन चिति के अन्य प्रस्तार बनाए जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उखा श्येनचिति का आधार है। उषा का अर्थ होता है सूर्योदय से पूर्व की स्थिति। उखा उषा का मर्त्य स्तर का रूप है। इस उखा को उषा बनाना है। तब इस उषा से सूर्य रूपी श्येन का जन्म होगा। पुराणों में अरुण को गरुड का अग्रज कहा गया है। अरुण को अनूरु कहा गया है, वह ऊरु या उरु, विस्तीर्ण स्थिति से रहित है। अरुण सूर्य के रथ का सारथी भी है। पुराणों में गरुड अरुण को शिक्षा देता है।

चित्र 6 श्येन चिति की प्रथम दो चितियां

            तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.11.1.1 में नाचिकेताग्नि चयन का आरम्भ इस प्रकार किया गया है कि पहले लोक की प्रतिष्ठा करनी है, लोक में तप को विकसित करना है, तप में तेज को, तेज में समुद्र को, समुद्र में आपः को, आपः में पृथिवी को, पृथिवी में  अग्नि को, अग्नि में अन्तरिक्ष को, अन्तरिक्ष में वायु को, वायु में द्युलोक को, द्युलोक में सूर्य को, सूर्य में चन्द्रमा को, चन्द्रमा में नक्षत्रों को, नक्षत्रों में संवत्सर की, संवत्सर में ऋतुओं की, ऋतुओं में मासों की, मासों में अर्धमासों की, अर्धमासों में भूत और भव्य के प्रतीक अहोरात्र की - - -- । इस कथन में लोक से पहली स्थिति अंग्रेजी का शब्द लक हो सकता है भाग्य पर निर्भर स्थिति, जिसको लगता है कि तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहने की आवश्यकता नहीं समझी गई है। ऋग्वेद की ऋचाओं में सार्वत्रिक रूप से ऊँ लोक का उल्लेख आता है जिसका विस्तार उरु लोक के रूप में किया गया है। यदि सावित्र चयन किया जाना है तब तो ऊँ से लेकर उरु लोक(ऊँ भूः,भुवः, स्वः) को तुरंत, ऊर्ध्व रूप में किया जा सकता है। लेकिन नाचिकेत चयन की स्थिति में भूः, भुवः, स्वः से पूर्व अन्य स्थितियों की स्थापना कही गई है।

इस टिप्पणी के सभी चित्र ज्योति अप्तोर्याम सोमयाग (साग्निचितिक), गार्ग्यपुरम्, कर्नूल, आंध्रप्रदेश से साभार ग्रहण किए गए हैं।

 

 

नचिकेता

टिप्पणी : नचिकेता न - चिकेत अर्थात् न दिखाई देने वाला, अदृश्य । स्थूल भोगों से विरत होकर जब मन अन्तर्मुखी होता है तो इन्द्रिय रूपी देवों के लिए अदृश्य हो जाता है , अत: नचिकेता बन जाता है । मन रूपी नचिकेता ही भोगों से विरत जीवात्मा का वह पुत्र है जो यम के पास पहुंचने की सामर्थ्य रखता है। - फतहसिंह

त्रिणाचिकेत अग्नि(ऋ. १०.५१) : मनोमय जीवात्मा की ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और इच्छाशक्ति की त्रयी के अदृश्य होने पर त्रिणाचिकेत अग्नि उत्पन्न होती है(वेद सविता फरवरी १९८६) - फतहसिंह

     चिकेत शब्द से ऐसा आभास मिल रहा है कि यह अनायास बोध की अवस्था है। कित् ज्ञाने। डा. अभयदेव शर्मा के अनुसार यह अविद्या की, भक्त की, अविद्वान् की स्थिति है। भक्त के लिए किसी विद्या को ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। सब विद्याएं उसे अनायास ही आ जाती हैं। यदि अनायास बोध न हो(न-चिकेत) तो फिर क्रमबद्ध रूप से विद्या को ग्रहण करना पडेगा। यह विद्वान् बनने की स्थिति है। यह अन्वेषणीय है कि क्या यह परिकल्पना वैदिक साहित्य के नचिकेता की व्याख्या करने में समर्थ है?

     व्यवहार में नचिकेता का महत्व इस प्रकार है कि श्राद्ध में ब्राह्मणों के भोजन करते समय नचिकेता आख्यान सुनाने का निर्देश है।

प्रथम लेखन : ५-५-२०१३ई. (वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् २०७०), संशोधन १३-२-२०१५ई.(फाल्गुन कृष्ण नवमी, विक्रम संवत् 2071)

 

संदर्भ(अपूर्ण)

*उ॒षो न जा॒रो, वि॒भावो॒स्रः संज्ञा॑तरूप॒श्चिके॑तदस्मै।(दे. अग्निः) - ऋ. १.६९.५

*न जा॒मिभि॒र्वि चि॑किते॒ वयो॑ नो वि॒दा दे॒वेषु॒ प्रम॑तिं चिकि॒त्वान्॥(दे. अग्निः) - ऋ. १.७१.७

     वयः(पक्षी) जामियों(एक जैसी घटित होने वाली घटनाओं) द्वारा हमारा वि-चिकेतन नहीं करता है। हे अग्नि, तुम चिकेतन करने वाली हो, देवों के बीच हमारे लिए प्रमति को ढूंढो।

*र॒यिर्न यः पि॑तृवि॒त्तो व॑यो॒धाः सु॒प्रणी॑तिश्चिकि॒तुषो॒ न शासुः॑।(दे. अग्निः) - ऋ. १.७३.१

*स घा॒ तं वृष॑णं॒ रथ॒मधि॑ तिष्ठाति गो॒विद॑म्। यः पात्रं॑ हारियोज॒नं पू॒र्णमि॑न्द्र॒ चिके॑तति॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥ - ऋ. १.८२.४

     हे इन्द्र, वही गो को जानने वाले वृषण रथ में बैठ पाता है जो पूर्ण हारियोजन पात्र का चिकेतन करता है। हे इन्द्र, अपने हरियों को रथ में जोडो।

     सोमयाग के सुत्या अह में सोम की आहुतियां देने के लिए द्रोणकलश में से सोम विभिन्न पात्रों में ग्रहण करके उन पात्रों द्वारा आहुतियां देते हैं। सुत्या अह के अन्तिम चरण में उन्नेता नामक ऋत्विज अपने सिर पर द्रोणकलश को रखकर उससे ही आहुतियां देता है। यह कृत्य हारियोजन ग्रह कहलाता है जिसके विषय में कहा जाता है कि ऋक् और साम यह इन्द्र के हरि-द्वय हैं(मनुष्य रथ के हरि द्वय क्षुधा व तृष्णा हो सकते हैं)। द्रोणकलश का मुख ओंकार सदृश होता है और सोमलता को निचोड कर रस को छानकर द्रोणकलश में एकत्र किया जाता है। हो सकता है कि हारियोजन पात्र को पूर्ण कहने से तात्पर्य सोमरस से युक्त द्रोणकलश से हो।

*त्वं सो॑म॒ प्र चि॑कितो मनी॒षा त्वं रजि॑ष्ठ॒मनु॑ नेषि॒ पन्था॑म्। - ऋ. १.९१.१

*ए॒तच्च॒न त्वो॒ वि चि॑केतदेषां स॒त्यो मन्त्रः॑ कविश॒स्त ऋघा॑वान्।(दे. मित्रावरुणौ) - ऋ. १.१५२.२

*अ॒पादे॑ति प्रथ॒मा प॒द्वती॑नां॒ कस्तद् वां॑ मित्रावरु॒णा चि॑केत। गर्भो॑ भा॒रं भ॑र॒त्या चि॑दस्य ऋ॒तं पिप॒र्त्यनृ॑तं॒ नि ता॑रीत्॥ - ऋ. १.१५२.३

     हे मित्र और वरुण! चरणहीन उषा पैरों वाले मनुष्यों से पहले ही आ जाती है, ऐसा तुम्हारे ही कारण होता है, इस बात का चिकेतन कौन करता है? इसका गर्भ (सूर्य) ऋत की पूर्ति और अनृत का विरोध करने का भार धारण करता है।

*अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन् पृ॑च्छामि वि॒द्मने न वि॒द्वान्। वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म्॥ - ऋ. १.१६४.६

*द्वाद॑श प्र॒धय॑श्च॒क्रमेकं॒ त्रीणि॒ नभ्या॑नि॒ क उ॒ तच्चि॑केत। तस्मि॑न् त्सा॒कं त्रिंश॒ता न श॒ङ्कवो॑ ऽर्पि॒ताः ष॒ष्टिर्न च॑लाच॒लासः॑॥ - ऋ. १.१६४.४८

*स चि॒त्रेण॑ चिकिते॒ रंसु॑ भा॒सा जु॑जु॒र्वाँ यो मुहु॒रा युवा॒ भूत्॥(दे. अग्निः) - ऋ. २.४.५

उपरोक्त ऋचा में रंसु का अर्थ श्री सायणाचार्य द्वारा रम् रमणीयम् के आधार पर किया गया है। डा. मधुसूदन मिश्र ने रंसु का अर्थ राख लिया है। राख में भास।

*न द॑क्षि॒णा वि चि॑किते॒ न स॒व्या न प्रा॒चीन॑मादित्या॒ नोत प॒श्चा। पा॒क्या॑ चिद् वसवो धी॒र्या॑ चिद् यु॒ष्मानी॑तो॒ अभ॑यं॒ ज्योति॑रश्याम्॥ - ऋ. २.२७.११

*तपो॑ वसो चिकिता॒नो अ॒चित्ता॒न् वि ते॑ तिष्ठन्ताम॒जरा॑ अ॒यासः॑॥(दे. अग्निः) - ऋ. ३.१८.२

*शंसा॑त्यु॒क्थमु॒शने॑व वे॒धाश्चि॑कि॒तुषे॑ असु॒र्याय॒ मन्म॑॥(दे. इन्द्रः) - ऋ. ४.१६.२

*कद॑स्य चि॒त्रं चि॑किते॒ कदू॒ती वृ॒धे भु॑वच्छशमा॒नस्य॒ यज्योः॑॥ - ऋ. ४.२३.२

*त्रै॒वृ॒ष्णो अ॑ग्ने द॒शभिः॑ स॒हस्रै॒र्वैश्वा॑नर॒ त्र्य॑रुणश्चिकेत॥ - ऋ. ५.२७.१

*यो अ॑स्मै सुम॒तिं वाज॑सातौ स्तु॒तो जने॑ सम॒र्य॑श्चि॒केत॑॥(दे. इन्द्रः) - ऋ. ५.३३.१

*आ चि॑कितान सु॒क्रतू॑ दे॒वौ म॑र्त रि॒शाद॑सा। वरु॑णाय ऋ॒तपे॑शसे दधी॒त प्रय॑से म॒हे॥ - ऋ. ५.६६.१

*अधा॒ हि काव्या॑ यु॒वं दक्ष॑स्य पू॒र्भिर॑द्भुता। नि के॒तुना॒ जना॑नां चि॒केथे॑ पूतदक्षसा॥(दे. मित्रावरुणौ) - ऋ. ५.६६.४

*प्र या म॑हि॒म्ना म॒हिना॑सु॒ चेकि॑ते द्यु॒म्नेभि॑र॒न्या अ॒पसा॑म॒पस्त॑मा। रथ॑ इव बृह॒ती वि॒भ्वने॑ कृ॒तोप॒स्तुत्या॑ चिकि॒तुषा॒ सर॑स्वती॥ ऋ. ६.६१.१३

*त्रिश्चि॑द॒क्तोः प्र चि॑कितु॒र्वसू॑नि॒ त्वे अ॒न्तर्दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य।(दे. अग्निः) - ऋ. ७.११.३

*न॒हि स्वमायु॑श्चिकि॒ते जने॑षु॒ तानीदंहां॒स्यति॑ पर्ष्य॒स्मान्॥(दे. इन्द्रः) - ऋ. ७.२३.२

*उद् वां॒ चक्षु॑र्वरुण सु॒प्रती॑कं दे॒वयो॑रेति॒ सूर्य॑स्तत॒न्वान्। अ॒भि यो विश्वा॒ भुव॑नानि॒ चष्टे॒ स म॒न्युं मर्त्ये॒ष्वा चि॑केत॥ - ऋ. ७.६१.१

*सुवि॒ज्ञा॒नं चि॑कि॒तुषे॒ जना॑य॒ सच्चास॑च्च॒ वच॑सी पस्पृधाते। तयो॒र्य॑त् स॒त्यं य॑त॒रदृजी॑य॒स्तदित् सोमो॑ऽवति॒ हन्त्यास॑त्॥ - ऋ. ७.१०४.१२

     जो व्यक्ति सुविज्ञान का चिकेतन करना चाहता है, उसके लिए सत्य और असत्य वचनों में प्रतिस्पर्द्धा होती है। उसमें जो सत्य और ऋजु होता है, सोम उसकी रक्षा करता है और जो असत् है, उसका नाश करता है।

*अ॒यं वां घ॒र्मो अ॑श्विना॒ स्तोमे॑न॒ परि॑ षिच्यते। अ॒यं सोमो॒ मधु॑मान् वाजिनीवसू॒ येन॑ वृ॒त्रं चिके॑तथः॥ - ऋ. ८.९.४

*यो वा॑मुरु॒व्यच॑स्तमं॒ चिके॑तति नृ॒पाय्य॑म्। व॒र्तिर॑श्विना॒ परि॑ यातमस्म॒यू॥ - ऋ. ८.२६.१४

     हे अश्विनौ, जो तुम्हारे लिए उरुव्यचस्तम और नृपाय्य वर्ति का चिकेतन करता है, उसके लिए - - - -। इस ऋचा में वर्ति का अर्थ सुषुम्ना नाडी भी हो सकता है। वर्ति दीपक की बत्ती को कहते हैं। वर्ति का एक अर्थ वर्तन करने वाली भी होता है, अर्थात् जैसे पहले दिन कोई घटना घटी, वैसी ही दूसरे दिन भी घटनी चाहिए, उसमें परिवर्तन नहीं होना चाहिए।

*अचे॑त्य॒ग्निश्चि॑कि॒तुर्ह॑व्य॒वाट् स सु॒मद्र॑थः। - ऋ. ८.५६.५

*त्वं पुर॑ इन्द्र चि॒किदे॑ना॒ व्योज॑सा शविष्ठ शक्र नाश॒यध्यै॑। - ऋ. ८.९७.१४

*प्र नु वो॑चं चिकि॒तुषे॒ जना॑य॒ मा गामना॑गा॒मदि॑तिं वधिष्ट॥ - ऋ. ८.१०१.१५

*स न॒ ईळा॑नया स॒ह दे॒वाँ अ॑ग्ने दुव॒स्युवा॑। चि॒किद्वि॑भान॒वा व॑ह॥ - ऋ. ८.१०२.२

*चि॒किद्वि भा॑ति भा॒सा बृ॑ह॒ता ऽसि॑क्नीमेति॒ रुश॑तीम॒पाज॑न्॥(दे. अग्निः) - ऋ. १०.३.१

*अ॒स्य यामा॑सो बृह॒तो न व॒ग्नूनिन्धा॑ना अ॒ग्नेः सख्युः॑ शि॒वस्य॑। ईड्य॑स्य॒ वृष्णो॑ बृह॒तः स्वासो॒ भामा॑सो॒ याम॑न्न॒क्तव॑श्चिकित्रे॥ - ऋ. १०.३.४

*ऐच्छा॑म त्वा बहु॒धा जा॑तवेदः॒ प्रवि॑ष्टमग्ने अ॒प्स्वोष॑धीषु। तं त्वा॑ य॒मो अ॑चिकेच्चित्रभानो द॒शान्तरु॒ष्याद॑ति॒रोच॑मानम्॥ - ऋ. १०.५१.३

*हो॒त्राद॒हं वरुण॒ बिभ्य॑दायं॒ नेदे॒व मा॑ यु॒नज॒न्नत्र॑ दे॒वाः। तस्य॑ मे त॒न्वो॑ बहु॒धा निवि॑ष्टा ए॒तमर्थं॒ न चि॑केता॒हम॒ग्निः॥ - ऋ. १०.५१.४

*तद्वा॑मृ॒तं रो॑दसी॒ प्र ब्र॑वीमि॒ जाय॑मानो मा॒तरा॒ गर्भो॑ अत्ति। नाहं दे॒वस्य॒ मर्त्य॑श्चिकेता॒ऽग्निर॒ङ्ग विचे॑ताः॒ स प्रचे॑ताः॥ - ऋ. १०.७९.४

*कमृ॒त्विजा॑मष्ट॒मं शूर॑माहु॒र्हरी॒ इन्द्र॑स्य॒ नि चि॑काय॒ कः स्वि॑त्॥ - ऋ. १०.११४.९

*अ॒हं राष्ट्री॑ सं॒गम॑नी॒ वसू॑नां चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम्।(दे. आत्मा) ऋ. १०.१२५.३

*स इन्नु रा॒यः सुभृ॑तस्य चाकन॒न्मदं॒ यो अ॑स्य॒ रंह्यं॒ चिके॑तति।(दे. इन्द्रः) ऋ. १०.१४७.४

     रंह्यं रथ में जोडने योग्य

*नाचिकेताग्निचयनम् अ॒यं वाव यः पव॑ते। सो॑ऽग्निर्ना॑चिके॒तः। स यत्प्राङ् पवते। तद॑स्य॒ शिरः॑। अथ॒ यद्द॑क्षि॒णा। स दक्षि॑णः प॒क्षः। अथ॒ यत्प्र॒त्यक्। तत्पुच्छ॑म्। यदुद॑ङ्। स उत्त॑रः प॒क्षः। अथ॒ यत्सं॒वाति॑। तद॑स्य स॒मञ्च॑नं च प्र॒सार॑णं च। अथो॑ सं॒पदे॒वास्य॒ सा। सँँ ह॒ वा अ॑स्मै॒ स कामः॑ पद्यते। यत्का॑मो॒ यज॑ते। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। य़ो ह॒ वा अ॒ग्नेर्ना॑चिके॒तस्या॒ऽऽयत॑नं प्रति॒ष्ठां वेद॑। आ॒यत॑नवान्भवति। गच्छ॑ति प्रति॒ष्ठाम्। हिर॑ण्यं॒ वा अ॒ग्नेर्ना॑चिके॒तस्या॒ऽऽयत॑नं प्रतिष्ठा॒। य ए॒वं वेद॑। आ॒यत॑नवान्भवति। गच्छ॑ति प्रति॒ष्ठाम्। यो ह॒ वा अ॒ग्नेर्ना॑चिके॒तस्य॒ शरी॑रं॒ वेद॑। सश॑रीर ए॒व स्व॒र्गं लो॒कमे॑ति। हिर॑ण्यं॒ वा अ॒ग्नेर्ना॑चिके॒तस्य॒ शरी॑रम्। य ए॒वं वेद॑। सश॑रीर ए॒व स्व॒र्गं लो॒कमे॑ति। अथो॒ यथा॑ रु॒क्म उत्त॑प्तो भा॒य्यात्। ए॒वमे॒व स तेज॑सा॒ यश॑सा। अ॒स्मिँँश्च॑ लो॒के॑ऽमुष्मि॑ँँश्च भाति। उ॒रवो ह॒ वै नामै॒ते लो॒काः। येऽव॑रेणाऽऽदि॒त्यम्। अथ॑ है॒ते वरी॑याँँसो लो॒काः। ये परे॑णाऽऽदि॒त्यम्। अन्त॑वन्तँँ ह॒ वा ए॒ष क्ष॒य्यं लो॒कं ज॑यति। योऽव॑रेणाऽऽदि॒त्यम्। अथ॑ है॒षो॑ऽन॒न्तम॑पा॒रम॑क्ष॒य्यं लो॒कं ज॑यति। यः परे॑णाऽऽदि॒त्यम्। अ॒न॒न्तँँ ह॒ वा अ॑पा॒रम॑क्ष॒य्यं लो॒कं ज॑यति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। अथो॒ यथा॒ रथे॒ तिष्ठ॒न्पक्ष॑सी पर्या॒वर्त॑माने प्र॒त्यपे॑क्षते। ए॒वम॑होरा॒त्रे प्र॒त्यपे॑क्षते। नास्या॑होरा॒त्रे लो॒कमा॑प्नुतः। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.७.१-४

     उपरोक्त कथन में आदित्य से अवर लोक को अन्त-युक्त व क्षय होने वाला तथा आदित्य से पर लोक को अनन्त, अपार, अक्षय कहा गया है। कठोपनिषद में नचिकेता यम से दूसरे वर के रूप में अक्षय स्थिति का वर मांगता है और यम उसे नाचिकेत अग्नि के चयन का रहस्य बता देते हैं। तीसरे वर के रूप में नचिकेता मृत्यु से हीन स्थिति को जानना चाहता है जिसके उत्तर में यम ओंकार की स्थिति का वर्णन करते हैं। डा. फतहसिंह इन दो स्थितियों का अनुमान वेद की भाषा में ईम् व ऊम् के रूप में लगाते थे। वैदिक मन्त्रों में जहां-जहां भी ईम् और उ प्रकट हुआ है, उसकी व्याख्या श्री सायणाचार्य द्वारा मन्त्र के छन्द की मात्रा पूर्ति के लिए निरर्थक अक्षर के रूप में की गई है। लेकिन डा. फतहसिंह का अनुमान है कि इनमें गंभीर रहस्य निहित हैं।

*उ॒शन्ह॒ वै वा॑जश्रव॒सः स॑र्ववेद॒सं द॑दौ। तस्य॑ ह॒ नचि॑केता॒ नाम॑ पु॒त्र आ॑स। तँँ ह॑ कुमा॒रँँ सन्त॑म्। दक्षि॑णासु नी॒यमा॑नास॒ श्र॒द्धाऽऽवि॑वेश। स हो॑वाच। तत॒ कस्मै॒ मां दा॑स्य॒सीति॑। द्वि॒तीयं॑ तृ॒तीय॑म्। तँँ ह॒ परी॑त उवाच। मृ॒त्यवे॑ त्वा ददा॒मीति॑। तँँ ह॒ स्मोत्थि॑तं॒ वाग॒भिव॑दति। गौत॑म कुमा॒रमिति॑। स हो॑वाच। परे॑हि मृ॒त्योर्गृ॒हान्। मृ॒त्यवे॒ वै त्वा॑ऽदा॒मिति॑। तं वै प्र॒वस॑न्तं ग॒न्तासीति॑ होवाच। तस्य॑ स्म ति॒स्रो रात्री॒रना॑श्वान्गृ॒हे व॑सतात्। स यदि॑ त्वा पृ॒च्छेत्। कुमा॑र॒ कति॒ रात्री॑रवात्सी॒रिति॑। ति॒स्र इति प्रति॑ब्रूतात्। किं प्र॑थ॒माँँ रात्रि॑माश्ना इति॑। प्र॒जां त॒ इति॑। किं द्वि॒तीयामिति॑। प॒शूँँस्त॒ इति॑। किं तृ॒तीया॒मिति॑। सा॒धुकृ॒त्यां त॒ इति॑। तं वै स॑न्तं जगाम। तस्य॑ य ह ति॒स्रो रात्री॒रना॑श्वान्गृ॒ह उ॑वास। तमा॒गत्य॑ प्रपच्छ। कुमा॑र॒ कति॒ रात्री॑रवात्सी॒रिति॑। ति॒स्र इति॒ प्रत्यु॑वाच। किं प्र॑थ॒माँँ रात्रि॑माश्ना॒ इति। प्र॒जां त॒ इति॑। किं द्वि॒तीया॒मिति॑। प॒शूँँस्त॒ इति॑। किं तृ॒तीया॒मिति॑। सा॒धुकृ॒त्यां त॒ इति॑। नम॑स्ते अस्तु भगव॒ इति होवाच। वरं॑ वृणी॒ष्वेति॑। पि॒तर॑मे॒व जीव॑न्नया॒नीति॑। द्वि॒तीयं॑ वृणी॒ष्वेति॑। इ॒ष्टा॒पूर्तयो॒र्मेऽक्षि॑तिं ब्रू॒हीति॑ होवाच। तस्मै॑ है॒तम॒ग्निं ना॑चिके॒तमु॑वाच। ततो॒ वै तस्ये॑ष्टापू॒र्ते ना क्षी॑येते। नास्ये॑ष्टापू॒र्ते क्षी॑येते। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नुते। य उ॑ नैनमे॒वं वेद॑। तृ॒ती॑यं वृणी॒ष्वेति॑। पु॒न॒र्मृ॒त्योर्मेऽप॑चितिं ब्रू॒हीति॑ होवाच। तस्मै॑ है॒तम॒ग्निं ना॑चिके॒तमु॑वाच। ततो॒ वै सोऽप॑ पुनर्मृ॒त्युम॑जयत्। अप॑ पु॒नर्मृ॒त्युं ज॑यति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.८.१-५

     तैत्तिरीय ब्राह्मण के उपरोक्त कथन की तुलना कठोपनिषद के आख्यान से की जा सकती है। कठोपनिषद में दूसरे वर के रूप में क्षय-अक्षय का उल्लेख तो आया है, लेकिन इष्टापूर्त का उल्लेख नहीं है। जैसा कि इष्टापूर्त शब्द की टिप्पणी में उल्लेख किया जा चुका है, इष्ट से अर्थ श्रुत ज्ञान की प्राप्ति से हो सकता है और पूर्त से अर्थ श्रुत ज्ञान को अपने जीवन में उतारने से, स्मृति के स्तर पर उतारने से, मर्त्य स्तर पर उतारने से हो सकता है। तीसरे वर के रूप में कठोपनिषद में मृत्यु के पार जाने के उपाय की चर्चा है जो यहां भी है। लेकिन तैत्तिरीय ब्राह्मण में दोनों वरों के उत्तर में यम द्वारा नाचिकेत अग्नि के चयन का ही निर्देश है, जबकि कठोपनिषद में तीसरे वर के उत्तर में ओंकार स्थिति प्राप्त करने का विस्तृत वर्णन है।

*का॒म॒चारो॑ ह॒ वा अ॑स्यो॒रुषु॑ च॒ वरी॑यःसु च लो॒केषु॑ भवति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.१०.२

*तँँ है॒तमेके॑ पशुब॒न्ध ए॒वोत्त॑रवे॒द्यां चि॑न्वते। उ॒त्त॒र॒वे॒दिसं॑मित ए॒षो॑ऽग्निरिति॒ वद॑न्तः। तन्न तथा॑ कु॒र्यात्। ए॒तम॒ग्निं कामे॑न॒ व्य॑र्धयेत्। स ए॑नं॒ कामे॑न॒ व्यृ॑द्धः। कामे॑न॒ व्य॑र्धयेत्। सौ॒म्ये वावैन॑मध्व॒रे चि॑न्वी॒त। यत्र॑ वा॒ भूयि॑ष्ठा॒ आहु॑तयो हू॒येर॑न्। ए॒तम॒ग्निं कामे॑न॒ सम॑र्धयति। स ए॑नं॒ कामे॑न॒ समृ॑द्धः। कामे॑न॒ सम॑र्धयति। - तै.ब्रा. ३.११.९.१

*अथ॑ हैनं पु॒रर्ष॑यः। उ॒त्त॒र॒वे॒द्यामे॒व स॒त्रिय॑मचिन्वत। ततो॒ वै तेऽवि॑न्दन्त प्र॒जाम्। अ॒भि स्व॒र्गं लो॒कम॑जयन्। वि॒न्दत॑ ए॒व प्र॒जाम्। अ॒भि स्व॒र्गं लो॒कं ज॑यति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.९.२

*अथ॑ हैनं वा॒युर्ऋद्धि॑कामः। य॒था॒न्यु॒प्तमे॒वोप॑दधे। ततो॒ वै स ए॒तामृद्धि॑मार्ध्नोत्। यामिदं॒ वा॒युर्ऋ॒द्धः। ए॒तामृद्धि॑मृध्नोति। यामि॒दं वा॒युर्व्यृ॒द्धः। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.९.२-३

*अथ॑ हैनं गोब॒लो वार्ष्णः॑ प॒शुका॑मः। पाङ्क्त॑मे॒व चि॑क्ये। पञ्च॑ पु॒रस्ता॑त्। पञ्च॑ दक्षिण॒तः। पञ्च॑ प॒श्चात्। पञ्चो॑त्तर॒तः। एकां॒ मध्ये॑। ततो॒ वै स स॒हस्रं॑ प॒शून्प्राप्नो॑त्। प्र स॒हस्रं॑ प॒शूना॑प्नोति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.९.३-४

*अथ॑ हैनं प्र॒जाप॑ति॒र्ज्यैष्ठ्य॑कामो॒ यश॑स्कामः प्र॒जन॑नकामः। त्रि॒वृत॑मे॒व चि॑क्ये। स॒प्त पु॒रस्ता॑त्। ति॒स्रो द॑क्षिण॒तः। स॒प्त प॒श्चात्। ति॒स्र उ॑त्तर॒तः। एकां॒ मध्ये॑। ततो॒ वै स प्र यशो॒ ज्यैष्ठ्य॑माप्नोत्। ए॒तां प्रजा॑तिं॒ प्राजा॑यत। यामि॒दं प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते। त्रि॒वृद्वै ज्यैष्ठ्य॑म्। मा॒ता पि॒ता पु॒त्रः। त्रि॒वृत्प्र॒जन॑नम्। उ॒पस्थो॒ योनि॑र्मध्य॒मा। प्र यशो॒ ज्यैष्ठ्य॑माप्नोति। ए॒तां प्रजा॑तिं॒ प्रजा॑यते। यामि॒दं प्र॒जाः प्रजाय॑न्ते। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.९.४-६

*सं॒व॒त्स॒रो वा अ॒ग्निर्ना॑चिके॒तः। तस्य॑ वस॒न्तः शिरः॑। ग्री॒ष्मो दक्षि॑णः प॒क्षः। व॒र्षा उत्त॑रः। श॒रत्पुच्छ॑म्। मासाः॑ कर्मका॒राः। अ॒हो॒रा॒त्रे श॑तरु॒द्रीय॑म्। प॒र्जन्यो॒ वसो॒र्धारा॑। यथा॒ वै प॒र्जन्यः॒ सुवृ॑ष्टं वृ॒ष्ट्वा। प्र॒जाभ्यः॒ सर्वा॒न्कामा॑न्त्संपू॒रय॑ति। ए॒वमे॒व स तस्य॒ सर्वा॒न्कामा॒न्त्संपू॑रयति। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नुते। य उ॑ चैनमे॒वं वेद॑। - तै.ब्रा. ३.११.१०.२-३

*सं॒व॒त्स॒रो वा अ॒ग्निर्ना॑चिके॒तः। तस्य॑ वस॒न्तः शिरः॑। ग्री॒ष्मो दक्षि॑णः प॒क्षः। व॒र्षाः पुच्छ॑म्। श॒रदुत्त॑रः प॒क्षः। हे॒म॒न्तो मध्य॑म्। पू॒र्वप॒क्षाश्चित॑यः। अ॒प॒र॒प॒क्षाः पुरी॑षम्। अ॒हो॒रा॒त्राणीष्ट॑काः। ए॒ष वाव सो॑ऽग्निर॑ग्नि॒मयः॑ पुनर्ण॒वः। अ॒ग्नि॒मयो॑ ह॒ वै पु॑नर्ण॒वो भू॒त्वा। स्व॒र्गं लो॒कमे॑ति। आ॒दि॒त्यस्य॒ सायु॑ज्यम्। यो॑ऽग्निं ना॑चिके॒तं चि॑नु॒ते। - तै.ब्रा. ३.११.१०.४

*ए॒तद्ध॑ स्म॒ वा आ॑हुः शण्डि॒लाः। कम॒ग्निं चि॑नुते। स॒त्रि॒यम॒ग्निं चि॑न्वा॒नः। सं॒व॒त्स॒रं प्र॒त्यक्षे॑ण। कम॒ग्निं चि॑नुते। सा॒वि॒त्रम॒ग्निं चि॑न्वा॒नः। अ॒मुमा॑दि॒त्यं प्र॒त्यक्षे॑ण। कम॒ग्निं चि॑नुते। ना॒चि॒के॒तम॒ग्निं चि॑न्वा॒नः। प्रा॒णान्प्र॒त्यक्षे॑ण। कम॒ग्निं चि॑नुते। चा॒तु॒र्हो॒त्रि॒यम॒ग्निं चि॑न्वा॒नः। ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षे॑ण। कम॒ग्निं चि॑नुते। वै॒श्व॒सृ॒जम॒ग्निं चि॑न्वा॒नः। शरी॑रं प्र॒त्यक्षे॑ण। - तै.आ. १.२२.१०-११

     सोमयाग के मुख्य सुत्या अह को आरम्भ करने से पूर्व उत्तरवेदी के समीप अग्निचयन करने का विधान है। अग्निचयन एक जटिल प्रक्रिया है। यदि अग्निचयन न करना है तो उत्तरवेदी के खर में सावित्रचयन किया जाता है। तैत्तिरीय आरण्यक का उपरोक्त कथन बताता है कि सावित्र अग्नि का चयन आदित्य का चयन है। आदित्य को तीव्र गति से प्रगति करने वाले प्राण कह सकते हैं। दूसरी ओर मन्द गति से प्रगति करने वाले प्राण हैं जिन्हें लगता है कि नचिकेता नाम दिया गया है। नाचिकेत अग्नि का चयन किस समय किया जाता है, यह अज्ञात है। कठोपनिषद में नचिकेता यम से तीन वर मांगता है। पहला वर तो यह मांगता है कि उसके पिता के सामने जो उसका शव पडा है, वह जीवित हो जाए और उसके पिता का उस पर क्रोध न रहे। दूसरे वर के रूप में वह यम से यह जानना चाहता है कि क्षय की स्थिति से बाहर कैसे निकला जाए, अक्षय स्थिति को कैसे प्राप्त किया जाए। उत्तर में यमराज उसको अग्नि का चयन करने की विधि बता देते हैं और उस अग्नि का नाम नाचिकेत अग्नि रख देते हैं। उपनिषद में तो दूसरे वर के बारे में केवल इतना ही उल्लेख है। लेकिन वराह पुराण में इस संदर्भ में नरक की यातनाओं आदि का विस्तार से वर्णन कर दिया गया है। इसका अर्थ यह होगा कि कठोपनिषद में जिसे अग्नि चयन कहा जा रहा है, वह वास्तव में न्यूनतर अव्यवस्था को, न्यूनतर एण्ट्रांपी को प्राप्त करने की प्रक्रिया है। और न्यूनतर अव्यवस्था तभी प्राप्त हो सकती है जब पापों का नाश हो। इस वर की तुलना मुस्लिम सम्प्रदाय में प्रचलित इस आख्यान से की जा सकती है कि कयामत के दिन पैगम्बर साहब प्रकट होते हैं और तब सारे गडे मुर्दे उठकर खडे हो जाते हैं और पैगम्बर साहब उनके पाप-पुण्यों का हिसाब करते हैं।   तीसरे वर के रूप में नचिकेता यमराज से यह जानना चाहता है कि मृत्यु के पार कैसे जाया जाए। उत्तर में यमराज उसे बताते हैं कि जो अंगुष्ठ पुरुष है, उसका विस्तार कैसे किया जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि यह आदित्य प्राणों की स्थिति है।

*चातुर्होत्र : नाचिकेत एव मृत्युग्रहः स्यादित्यपरम्। तस्य स्विष्टकृतमनु होमः। होष्यन्नप उपस्पृशेद्विद्युदसि विद्य मे पाप्मानमिति। अथ जुहोत्यप मृत्यमप क्षुधमिति। अथ हुत्वोपस्पृशेद्वृष्टिरसि वृश्च मे पाप्मानमिति। तस्येडामनु भक्षः। - - -आप.श्रौ.सू. १९.१३.१७

*वैश्वसृज : सावित्रनाचिकेतचातुर्होत्रवैश्वसृजारुणकेतुकान्समस्यन्सौम्ये ऽप्यध्वरे चिन्वीत। सावित्रः प्रथमा चितिः। लोकंपृणा द्वितीया। नाचिकेतस्तृतीया। लोकंपृणा चतुर्थी। चातुर्होत्रः पंचमी। वैश्वसृजः षष्ठी। आरुणकेतुकः सप्तमी। सवनीययूष्णो मृत्यवे ग्रहं गृह्णाति। - आप.श्रौ.सू. १९.१५.१० 

*देवान्यक्षद्विद्वांश्चिकित्वान् इति। एष वै देवाननु विद्वान् यदग्निः। स एनाननु विद्वान् अनुष्ठ्या यक्षद् इत्येवैतदाह। - मा.श. १.५.१.६

*शुक्रामन्थिनौ ग्रहौ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वान्। तस्माऽइन्द्राय सुतमाजुहोत स्वाहा(वा.सं. ७.१४) इति। - मा.श. ४.२.१.२७

*सीद होतः स्वऽउ लोके चिकित्वान् इति। अग्निर्वै होता। तस्यैष स्वो लोको यत् कृष्णाजिनम्। चिकित्वान् इति। विद्वानित्येतत्। - मा.श. ६.४.२.६

*अयमग्निः सत्पतिश्चेकितानः इति। अयमग्निः सतां पतिश्चेतयमान इत्येतत्। - मा.श. ८.६.३.२०

*विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्ते। - मैत्रायण्युप. ७.९

*त्रिणाचिकादियोगान्ता ईश्वरभ्रान्तिमाश्रिताः। लोकायतादिसांख्यान्ता जीवविभ्रान्तिमाश्रिताः॥ - महोपनिषद ४.७४

*त्रिणाचिकादियोगान्ता ईश्वरभ्रान्तिमाश्रिताः। लोकायतादिसांख्यान्ता जीवविश्रान्तिमाश्रिताः॥ - वराहोपनिषद २.५५

अन्यो ह्यग्निरुखाप्यन्या नित्यमेवमवैहि भोः |
न चोपलिप्यते सोऽग्निरुखासंस्पर्शनेन वै ॥१६॥ - महाभारत शान्तिपर्व 315.16