Site hosted by Angelfire.com: Build your free website today!

पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Anapatya to aahlaada only)

by

Radha Gupta, Suman Agarwal, Vipin Kumar

Home Page

Anapatya - Antahpraak (Anamitra, Anaranya, Anala, Anasuuyaa, Anirudhdha, Anil, Anu, Anumati, Anuvinda, Anuhraada etc.)

Anta - Aparnaa ((Antariksha, Antardhaana, Antarvedi, Andhaka, Andhakaara, Anna, Annapoornaa, Anvaahaaryapachana, Aparaajitaa, Aparnaa  etc.)

Apashakuna - Abhaya  (Apashakuna, Apaana, apaamaarga, Apuupa, Apsaraa, Abhaya etc.)

Abhayaa - Amaavaasyaa (Abhayaa, Abhichaara, Abhijit, Abhimanyu, Abhimaana, Abhisheka, Amara, Amarakantaka, Amaavasu, Amaavaasyaa etc.)

Amita - Ambu (Amitaabha, Amitrajit, Amrita, Amritaa, Ambara, Ambareesha,  Ambashtha, Ambaa, Ambaalikaa, Ambikaa, Ambu etc.)

Ambha - Arishta ( Word like Ayana, Ayas/stone, Ayodhaya, Ayomukhi, Arajaa, Arani, Aranya/wild/jungle, Arishta etc.)

Arishta - Arghya  (Arishtanemi, Arishtaa, Aruna, Arunaachala, Arundhati, Arka, Argha, Arghya etc.)           

Arghya - Alakshmi  (Archanaa, Arjuna, Artha, Ardhanaareeshwar, Arbuda, Aryamaa, Alakaa, Alakshmi etc.)

Alakshmi - Avara (Alakshmi, Alamkara, Alambushaa, Alarka, Avataara/incarnation, Avantikaa, Avabhritha etc.)  

Avasphurja - Ashoucha  (Avi, Avijnaata, Avidyaa, Avimukta, Aveekshita, Avyakta, Ashuunyashayana, Ashoka etc.)

Ashoucha - Ashva (Ashma/stone, Ashmaka, Ashru/tears, Ashva/horse etc.)

Ashvakraantaa - Ashvamedha (Ashwatara, Ashvattha/Pepal, Ashvatthaamaa, Ashvapati, Ashvamedha etc.)

Ashvamedha - Ashvinau  (Ashvamedha, Ashvashiraa, Ashvinau etc.)

Ashvinau - Asi  (Ashvinau, Ashtaka, Ashtakaa, Ashtami, Ashtaavakra, Asi/sword etc.)

Asi - Astra (Asi/sword, Asikni, Asita, Asura/demon, Asuuyaa, Asta/sunset, Astra/weapon etc.)

Astra - Ahoraatra  (Astra/weapon, Aha/day, Ahamkara, Ahalyaa, Ahimsaa/nonviolence, Ahirbudhnya etc.)  

Aa - Aajyapa  (Aakaasha/sky, Aakashaganga/milky way, Aakaashashayana, Aakuuti, Aagneedhra, Aangirasa, Aachaara, Aachamana, Aajya etc.) 

Aataruusha - Aaditya (Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc.) 

Aaditya - Aapuurana (Aaditya, Aanakadundubhi, Aananda, Aanarta, Aantra/intestine, Aapastamba etc.)

Aapah - Aayurveda (Aapah/water, Aama, Aamalaka, Aayu, Aayurveda, Aayudha/weapon etc.)

Aayurveda - Aavarta  (Aayurveda, Aaranyaka, Aarama, Aaruni, Aarogya, Aardra, Aaryaa, Aarsha, Aarshtishena, Aavarana/cover, Aavarta etc.)

Aavasathya - Aahavaneeya (Aavasathya, Aavaha, Aashaa, Aashcharya/wonder, Aashvin, Aashadha, Aasana, Aasteeka, Aahavaneeya etc.)

Aahavaneeya - Aahlaada (Aahavaneeya, Aahuka, Aahuti, Aahlaada etc. )

 

 

Though holy fig tree (Ashwattha) appears as the  main theme of several hymns of Atharvaveda, but not much can be deciphered until one takes the help of what has been said in Bhagvad Gita about holy fig tree. Gita states that normally, this tree grows upside down, but due to sins, it can also happen that it’s roots are lower and branches are in upper direction. These statements can be deciphered in the way that a pure holy fig tree grows when one comes down from the state of trance, a state of complete tranquility. When one comes down from this state, it may happen that he completely forgets what happened in the state of trance, just as we forget after getting awake. But one is supposed to reap maximum benefits of sleep. The holy fig tree is the state after awakening. And this awakened state, the holy fig tree state has not appeared all of a sudden. One is supposed to get awakened gradually. And different levels of awakened state are supposed to control the lower and lower levels of awakening. At lower levels, there are so many hindrances- say our hunger, the fear of death, anger etc which make our life-supporting forces tremble. The holy fig tree talks of a remedy that let these life supporting forces be wrapped in such a form that nobody can threaten them. The other unique feature of holy fig tree is that a unique entanglement of speech, life-force and mind has been created, just like the entanglement of sun, moon and earth. In vedic literature, the concept of mind with reference to holy fig tree is very hidden, but it has been exposed in puranic literature  and this mind has been given the name parrot, literally meaning one who has become speechless. It is strange that the importance of this parrot is recognized only when one takes into account the seals of Indus culture where two unicorns have been depicted below the figure of holy fig tree. The unicorn in Indus culture may represent the Atman, the toe entity of vedic literature which controls the life forces. The ultimate goal of worshipping holy fig tree can be said to get drowned in divine love.    

अश्वत्थ

टिप्पणी : शौनकीय अथर्ववेद ३.६ सूक्त का देवता अश्वत्थ है। इसके अतिरिक्त, पैप्पलाद संहिता के सूक्तों १.६६ व २.५५ का देवता भी अश्वत्थ है। पैप्पलाद संहिता के अन्य मन्त्रों में जिन तथ्यों का उल्लेख है, उनमें से कुछ तथ्यों का विवेचन गीता व उपनिषदों आदि में प्रकट हुआ है। गीता १५.२ तथा मैत्रायणी उपनिषद ६.४ आदि में जिस अश्वत्थ वृक्ष की कल्पना की गई है, उसका मूल ऊपर की ओर और शाखाएं नीचे की ओर हैं। काठक संकलन १८.१, गीता १५.२ तथा पैप्पलाद संहिता १९.१९.१२ के अनुसार वेद उसका मूल है और छन्द उसके पत्ते हैं जो स्वर्णिम हैं। महाभारत उद्योगपर्व ४६.९ के अनुसार योगी जन इस हिरण्य पर्ण वाले अश्वत्थ के दर्शन करने में समर्थ होते हैं। गीता १५.३ में उल्लेख है कि यद्यपि यह अश्वत्थ की स्वाभाविक स्थिति है, लेकिन लोक में मनुष्य के कर्मों से बंधन पर इसका मूल नीचे की ओर फैलने लगता है और शाखाएं ऊपर-नीचे दोनों ओर फैलने लगती हैं। ऐसा अश्वत्थ नष्ट करने योग्य है। यह पुराणों का अश्वत्थ असुर हो सकता है। ऐसे असुर के लिए संसार रूपी अश्वत्थ के हिरण्य पद्म संसार के विषयभोग हैं जिसका उल्लेख संभवतः महाभारत उद्योगपर्व में किया गया है। सहज रूप में अश्वत्थ के वेद रूपी मूल को समाधि की स्थिति कह सकते हैं जिसका संकेत पैप्पलाद संहिता ९.२५.१२ से भी मिलता है। शाखाएं मन का रूप हैं। पैप्पलाद संहिता १.६६.२ आदि में अश्वत्थ से मणि(मन का उच्चतर रूप) का निर्माण किया गया है। अश्वत्थ इन्द्र की सभा व समिति हैं(पैप्पलाद संहिता १९.१९.१२ तथा १.६६.३)। डा. फतहसिंह के अनुसार मनोमय कोश सभा है जहां सभी इच्छाएं, भावनाएं एक साथ आ जाते हैं लेकिन अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं। समिति में सब मिलकर एकजुट हो जाते हैं। यह विज्ञानमय कोश है। डा. फतहसिंह के अनुसार विज्ञानमय कोश गुरु है जो मनोमय कोश रूपी शिष्य को आवश्यक निर्देश देता है। यही कारण है कि पुराणों में बृहस्पति/गुरु द्वारा अश्वत्थ वृक्ष के वरण के उल्लेख हैं। इसके अतिरिक्त, पैप्पलाद संहिता के कुछ मन्त्रों जैसे १९.११.१ में अश्वत्थ को तीसरे देवलोक में देवसदन कहा गया है जहां अमृत का स्वाद चखा जाता है।

     अश्वत्थ के मूल को वैदिक साहित्य में कईं प्रकार से समझाया गया है। मैत्रायणी संहिता १.६.१२ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.८.१२.२ इत्यादि के अनुसार जब प्रजापति अश्व रूप होकर अपना सिर भूमि में संवत्सर पर्यन्त छिपा लेते हैं, उससे अश्वत्थ की उत्पत्ति होती है। सिर को भूमि में छिपाने का निहितार्थ समाधि में जाना हो सकता है। पैप्पलाद संहिता के मन्त्रों(९.२५.११) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.१.३.९ में यह अश्व अग्नि का रूप है। इस प्रकार संवत्सर साधना अश्वत्थ वृक्ष का मूल है। संवत्सर का अर्थ होता है वाक्, प्राण और मन का परस्पर युग्मन। अग्नि को वाक् कह सकते हैं। तब अश्वत्थ में प्राण और मन कहां से आएंगे? संवत्सर साधना के लिए मन का नियन्त्रण किस प्रकार किया जाना है, यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। अश्वत्थ वृक्ष की शाखाओं को मन का रूप कहा गया है। अश्वत्थ के पत्तों को हिरण्मय पर्ण कहा गया है। पैप्पलाद संहिता १९.१९.१३ तथा काठक संकलन १८.१ में उल्लेख है कि अश्वत्थ के पर्ण छन्दों का रूप हैं (और वेद मूल का)। छन्द प्राण का रूप होते हैं। कहा जाता है कि अश्वत्थ सदैव अस्थिर रहता है, उसके पत्ते सदैव हिलते रहते हैं। भौतिक रूप से भले ही यह सत्य न हो, लेकिन वैदिक साहित्य की ऐसी ही धारणा है। यदि छन्द प्राणों का रूप हैं और अश्वत्थ के पर्ण छन्दों का रूप हैं तो प्राण किन कारणों से हिल सकते हैं? प्राणों को कंपाने वाले भय, क्रोध, मृत्यु आदि हो सकते हैं। लेकिन अश्वत्थ के पर्णों को छन्दों का रूप कहकर यह संकेत दे दिया गया है कि अब सारे प्राण छन्दों द्वारा छन्दित हैं, आवृत हैं और मृत्यु, भय आदि कोई उन्हें कम्पित नहीं कर सकता। छन्दों के रूप में एक आवरण का निर्माण कर दिया गया है। इसका व्यावहारिक रूप क्या होगा, यह अन्वेषणीय है। पुराणों में तो सारी देह पर विभिन्न देवताओं की स्थापना कर दी जाती है जिसे कवच कहते हैं। फिर प्राणों को कोई भय नहीं रहता। मैत्रायणी संहिता २.२.१ तथा काठक संहिता ११.६ के अनुसार विशः का जो वीर्य क्षरित हुआ, वह अश्वत्थ ने धारण कर लिया लेकिन उसको वह सम्यक् रूप से धारण न कर पाने के कारण कांपता रहता है। शतपथ ब्राह्मण ५.३.१.१४ के अनुसार इन्द्र ने अश्वत्थ में स्थित होकर मरुतों का आह्वान किया। इन कथनों से संकेत मिलता है कि किसी प्रकार से जो वीर्य, जो शक्ति हमारे विशः रूपी प्राणों के पास है, उसको ग्रहण करके अश्वत्थ के अवयवों का रूप देना है, उस विशः को अपनी आत्मा रूपी शक्ति के अनुकूल बनाना है। कथासरित्सागर की कथा में तो अश्वत्थ वृक्ष वित्त प्राप्ति का उपाय बताता है। क्या यह वित्त वही है जिसे विशः का वीर्य कहा गया है, यह चिन्तनीय है।

मैत्रायणी संहिता १.६.१२ में उल्लेख के अनुसार पुरूरवा व उर्वशी की कथा में पुरूरवा अग्नि को उखा में स्थापित कर देता है जिससे अश्वत्थ उत्पन्न हो जाता है। जो उखा है, वही शमी है, शम की अवस्था है, वह संवत्सर के १२ मासों को धारण करने वाली उषा है। यह आख्यान पैप्पलाद संहिता १९.१२.१ की व्याख्या है। ऐसा भी संभव है कि तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.८.१२.२ इत्यादि में अश्व रूप प्रजापति द्वारा संवत्सर पर्यन्त सिर को भूमि में छिपा लेने का तथ्य अश्वत्थ वृक्ष पर भी लागू होता हो। अश्वत्थ को यहां अश्वों का व्रज(अस्तबल) कहा गया है। संवत्सर अश्व को व्रज में बांधने की रस्सी है। यदि अश्वत्थ को संवत्सर के १३वें अधिक मास के रूप समझा जाए तो इससे पुराणों में अश्वत्थ के यज्ञ-विष्णु रूप की व्याख्या हो जाती है। शमी-गर्भ से उत्पन्न अश्वत्थ को पुराणों के अश्वत्थ और शनिवार के संदर्भ से सम्बद्ध माना जा सकता है क्योंकि शमी और शनि दोनों में मूल धातु शम् है। गरुड पुराण में शून्य अश्वत्थ को नमन का निर्देश है। यह शून्य अश्वत्थ कौन सा हो सकता है, यह अन्वेषणीय है। पुराणों में अश्वत्थ असुर द्वारा अश्वत्थ वृक्ष का स्पर्श करने वालों का भक्षण कर जाने और शनि द्वारा अश्वत्थ असुर को आन्त्रों को जला डालने की कथा आती है। शनि द्वारा आन्त्रों को जला डालने से किस प्रयोजन की सिद्धि हो सकती है, यह अन्वेषणीय है। आन्त्र भूख-प्यास के लिए उत्तरदायी हैं और भूख-प्यास ही प्राणों को सबसे अधिक मृत्यु भय से कंपाती हैं। 

 पुरूरवा द्वारा गन्धर्वों से जो अग्नि प्राप्त की गई, वह किस रूप में थी, इसका उल्लेख नहीं है। आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ५.२.४ के अनुसार जो अग्नि देवों से छिपकर अश्वत्थ में छिपी, वह अश्व रूप थी (अग्नि का एक रूप अश्व से भी निम्नतर है जिसे आखु/मूषक कहा गया है)। ऐसा प्रतीत होता है कि अश्व रूप अग्नि का कार्य पाण्डित्य में प्रेम का प्रादुर्भाव करना है। फिर जब पुरूरवा ने अरणियों द्वारा मन्थन किया, तो अग्नि तीन रूपों में प्रकट हुई – आहवनीय, दक्षिण और गार्हपत्य। यह कहा जा सकता है कि अश्व अग्नि दिशाओं के अनुदिश अपना विस्तार करने वाली है, जबकि पुरूरवा द्वारा अरणि मन्थन से उत्पन्न अग्नि का विस्तार ऊर्ध्व दिशा में होता है।

 

 (श्री पारपोला इत्यादि की पुस्तक Corpus of Indus Seals, भाग ३ से छायांकित)

(दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय से छायांकित)

वैदिक साहित्य में संवत्सर साधना के लिए मन का नियन्त्रण किस प्रकार किया जाना है, यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। अश्वत्थ वृक्ष की शाखाओं को मन का रूप कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि शतपथ ब्राह्मण ५.३.१.१४ में मन का प्रत्यक्ष रूप से उल्लेख न करके अप्रत्यक्ष रूप से उसे इन्द्र कह दिया गया है जो मरुत रूपी प्राणों पर नियन्त्रण रखता है। हमारी देह में हमारे प्राणों पर नियन्त्रण रखने वाला आत्मा या अङ्गुष्ठ पुरुष कहलाता है। पुराणों में अश्वत्थ वृक्ष पर निवास करने वाले अङ्गुष्ठ पुरुष को शुक नाम दिया गया है। कथा आती है कि जब अग्नि ने अश्वत्थ में प्रवेश किया तो अग्नि के ताप से पीडित होकर शुक वहां से निकल भागा। बाद में वह शुक व्यास-पुत्र शुक बना जिसने परीक्षित को भागवत सुनाई। इस कथा का निहितार्थ बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि  अग्नि यदि कहीं पर छिपेगा तो वह पापों को जलाएगा ही। अश्वत्थ में कौन से पाप हैं जिनको अग्नि जलाएगा, यह विचारणीय है। लोक में शुक तोते को कहते हैं, जबकि साहित्य में उस व्यक्ति को जिसने अपनी सारी इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया हो, कहीं से भी शक्ति का ह्रास न होता हो। सामरहस्योपनिषद से संकेत मिलता है कि शुक विद्वान ब्राह्मण है लेकिन उसने प्रेम रस का आस्वादन नहीं किया है। जैमिनीय ब्राह्मण ३.३५० में अहीन आश्वत्थि नामक एक ब्राह्मण का उल्लेख आता है जिसका लक्ष्य मधुस्तोक रूपी वनस्पति की प्राप्ति करना है। इस मधु को प्रेम रस का रूपान्तरण कह सकते हैं।

 उपरोक्त चित्र हडप्पा-कालीन मुद्राओं के हैं। पहली आकृति उभरी हुई बनाई गई है और दूसरी सपाट। एक ही आकृति का दो मुद्राओं में पाया जाना इसके महत्त्व को दर्शाता है। ऐसा अनुमान है कि सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं में इस अङ्गुष्ठ पुरुष को एकशृङ्गी मृग के रूप में चित्रित किया गया है। एक अनुमान तो यह लगाया जा सकता है कि गीता में जिन दो प्रकार के अश्वत्थों का उल्लेख है, उपरोक्त मुद्रा में दर्शाए गए दो एकशृङ्गी मृग उन दो स्थितियों के प्रतीक हो सकते हैं। दूसरा अनुमान यह लगाया जा सकता है कि आकृति में बडा तीर समाधि से व्युत्थान को दर्शाता है। यह व्युत्थान तीन स्थितियों में रूपान्तरित हो सकता है – दो एकशृङ्गी मृग तथा तीसरा अश्वत्थ। इस विषय में राजा परीक्षित की कथा का उल्लेख किया जा सकता है। राजा परीक्षित शमीक ऋषि के पास जाकर उनसे उत्तर पाना चाहते हैं लेकिन उत्तर न मिलने पर शमीक का तिरस्कार करते हैं और उनके गले में मृत सर्प डाल देते हैं। इस पर शमीक-पुत्र शृङ्गी शाप देता है कि सातवें दिन तक्षक तुम्हें डस ले। इस कथा में शमीक ऋषि समाधि का और शृङ्गी एकशृङ्गी मृग का प्रतीक हो सकता है। तक्षक एकशृङ्गी मृग का विपरीत पक्ष हो सकता है। स्वयं परीक्षित(परितः क्षितः, चारों ओर बिखरा हुआ) अश्वत्थ का रूप हो सकता है।

सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं के आधार पर ऐसा अनुमान है कि एकशृङ्गी मृग आत्मा का रूप है जिसे अपने कर्मों के अनुसार अन्तकाल में या तो देवदूत ग्रहण कर सकते हैं या यम के पार्षद। डा. डेनियल सलास ने अपने विश्लेषणों से यह अनुमान लगाया है कि मुद्रा में जो चक्राकार आकृति है, वह उत्तरायण का प्रतीक है और जो रोमन लिपि के B आकार की आकृति है, वह दक्षिणायन का प्रतीक है। यह अनुमान उचित ही प्रतीत होता है।

कर्मकाण्ड में, गया तीर्थ में लगभग ५१ पदों पर पितरों के तर्पण का निर्देश है जिनमें पितरों हेतु प्रथम पिण्ड विष्णु के पद में दिया जाता है और अन्तिम पिण्ड अश्वत्थ मूल में। गया में स्थित अश्वत्थ का अपना अलग ही महत्त्व कहा गया है। इसके अतिरिक्त मृत्यु पश्चात् नित्यकर्म में दशम दिन तक नित्यप्रति अश्वत्थ वृक्ष का सिंचन किया जाता है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, अश्वत्थ का अर्थ होगा जहां मन, प्राण और वाक् का युग्मन हो गया है। यह स्थिति पितर प्राण द्वारा अपने लिए उपयुक्त पथ का अन्वेषण करने में सहायता करती होगी, यही कहा जा सकता है।  

 

प्रथम लेखन – १९९३ ई., संशोधन : ७-१.२०१३ई.(पौष कृष्ण दशमी, विक्रम संवत् २०६९)

संदर्भ

*अत्राह॒ तद् व॑हेथे॒ मध्व॒ आहु॑तिं॒ यम॑श्व॒त्थमु॑प॒तिष्ठ॑न्त जा॒यवो॒ ऽस्मे ते स॑न्तु जा॒यवः॑। सा॒कं गावः॒ सुव॑ते॒ पच्य॑ते॒ यवो॒ न ते॑ वाय॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवो॒ नाप॑ दस्यन्ति धे॒नवः॑॥(दे. इन्द्रवायू) – ऋ. १.१३५.८

उपरोक्त ऋचा में इन्द्रवायु देवता-द्वय से प्रार्थना की जा रही है कि उस मधुमत् आहुति का वहन करो जिससे जायवः अश्वत्थ में बैठ जाएं, जायवः हमारे हो जाएं। श्री सायणाचार्य द्वारा जायवः का अर्थ यजमान किया गया है। यदि जैमिनीय ब्राह्मण ३.३५० को ध्यान में रखा जाए तो अश्वत्थ वनस्पति में यह संभावना है कि यह मधु-स्तोक प्रदान कर सकती है। जायवः का अर्थ समाधि से व्युत्थान पर प्राण हो सकते हैं जो मधु के लालच में अश्वत्थ में स्थिर हो सकते हैं।

*अ॒श्व॒त्थे वो॑ नि॒षद॑नं प॒र्णे वो॑ वस॒तिष्कृ॒ता। गो॒भाज॒ इत् किला॑सथ॒ यत् स॒नव॑थ॒ पूरु॑षम्॥(दे. ओषधयः) - ऋ. १०.९७.५

*भद्रा॑त् प्लक्षे॑ नि॑स्तिष्ठाश्वत्थे॑ खदिरे॑ धवे॑। भद्रा॑त्पर्णे॑ न्यग्रो॑धे सा॑ मां॑ रौत्सी॑दरुन्धती॑॥ - ऋग्वेद खिल ४.७.५

*अश्वत्थः॑ खदिरो॑ ध॑वः। अरदुः॑ परमः॑ शये। हत॑ इव पापपू॑रुषः। अ॑दोहमि॑त्पी॑यूषकम्॥ - ऋग्वेद खिल ५.१५.१४

*पुमा॑न् पुं॒सः परि॑जातोऽश्व॒त्थः ख॑दि॒रादधि॑। स ह॑न्तु॒ शत्रू॑न् माम॒कान् यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम्॥ तान॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ शत्रू॑न् वैबाध॒दोध॑तः। इन्द्रे॑ण वृत्र॒घ्ना मे॒दी मि॒त्रेण॒ वरु॑णेन च॥ यथा॑श्वत्थ नि॒रभ॑नो॒ऽन्तर्म॑ह॒त्यर्ण॒वे। ए॒वा तान्सर्वा॒न् निर्भ॑ङ्ग्धि यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम॥ यः सह॑मान॒श्चर॑सि सासहा॒न इ॑व ऋष॒भः। तेना॑श्वत्थ॒ त्वया॑ व॒यं स॒पत्ना॑न्त्सहिषीमहि॥ सि॒नात्वे॑ना॒न् निर्ऋ॑तिर्मृ॒त्योः पाशै॑रमो॒क्यैः। अश्व॑त्थ॒ शत्रू॑न् माम॒कान् यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम्॥ यथा॑श्वत्थ वानस्प॒त्याना॒रोह॑न् कृणु॒षेऽध॑रान्। ए॒वा मे॒ शत्रो॑र्मू॒र्धानं॒ विष्व॑ग् भिन्द्धि॒ सह॑स्व च॥ तेऽध॒राञ्चः॒ प्र प्ल॑वन्तां छि॒न्ना नौरि॑व॒ बन्ध॑नात्। न वै॑बा॒धप्र॑णुत्तानां॒ पुन॑रस्ति नि॒वर्त॑नम्॥ प्रैणा॑न् नुदे॒ मन॑सा॒ प्र चि॒त्तेनो॒त ब्रह्म॑णा। प्रैणा॑न् वृ॒क्षस्य॒ शाख॑याश्व॒त्थस्य॑ नुदामहे॥ - शौ.अ. ३.६

*यत्रा॑श्व॒त्था न्य॒ग्रोधा॑ महावृ॒क्षाः शि॑ख॒ण्डिनः॑। तत् परे॑ताप्सरसः॒ प्रति॑बुद्धा अभूतन॥ - शौ.अ. ४.३७.४

*अ॒श्व॒त्थो दे॑व॒सद॑नस्तृ॒तीय॑स्यामि॒तो दि॒वि। तत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णं दे॒वाः कुष्ठ॑मबन्धत॥ - शौ.अ. ५.४.३, ६.९५.१, तु. शौ.अ. १९.३९.६

*भ॒द्रात् प्ल॒क्षान्निस्ति॑ष्ठस्यश्व॒त्थात् ख॑दि॒राद्ध॒वात्। भ॒द्रान्न्य॒ग्रोधा॑त् प॒र्णात् सा न॒ एह्य॑रुन्धति॥ - शौ.अ. ५.५.५

*श॒मीम॑श्व॒त्थ आरू॑ढ॒स्तत्र॑ पुं॒सुव॑नं कृ॒तम्। तद् वै पु॒त्रस्य॒ वेद॑नं॒ तत् स्त्री॒ष्वा भ॑रामसि॥ - शौ.अ. ६.११.१, तु. पै.सं. १९.१२.१

*अ॒श्व॒त्थो द॒र्भो वी॒रुधां॒ सोमो॒ राजा॒मृतं॑ ह॒विः। व्री॒हिर्यव॑श्च भेष॒जौ दि॒वस्पु॒त्रावम॑र्त्यौ॥ - शौ.अ. ८.७.२०

*अ॒मून॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ खादा॒मून् ख॑दिराजि॒रम्। ता॒जद्भङ्ग॑ इव भज्यन्तां॒ हन्त्वे॑ना॒न् वध॑को व॒धैः॥ - शौ.अ. ८.८.३

*ध्रुवस् तिष्ठ भुवनस्य गोपा मस? व्यक्ता वनस्पते। अत्रैव त्वम् इह वयं सुवीरा विश्वा मृधो ऽपि महतीर् व्यस्य?॥१॥ यो वानस्पत्यानाम् अधिपतिर् बभूव यस्मिन्न् इमा विश्वा भुवनान्य् अर्पिता। तम् अनज्मि मधुना दैव्येन यस्मान् मणि निर्ममे विश्वरूपम्॥२॥ इमं मणिं विश्वजितं सुवीरम् अस्माद् अश्वत्थात् पर्य् उद् भरामि। येन विश्वाः पृतनास् संजयाम्य् अथो द्युमत् समितिम् आ वदामि॥३॥ सबन्धुश् चासबन्धुश् च यो न इन्द्राभिदासति। वृश्चाम्य् आ?तस्याहं मूलं प्रजां चक्षुर् अथो बलम्॥४॥ - पै.सं. १.६६

*दिवो जातो दिवस् पुत्रो अस्माज् जातं सहत् सहः। अश्वत्थम् अग्रे जैत्रायात् सहदेवं दामसि?॥१॥ तं त्वाम् आ यथा रथम् उप तिष्ठन्तु राजानः। सुमतिभ्यो वि वभुवे?॥२॥ त्वया वयं देवजात सर्वाः प्र शोचयामसि। उत सत्या उतानृताः॥३॥ यो अश्वत्थेन मित्रेण सुमतीर्? इव गच्छति। जयंश् च सर्वाः पृतना याश् च सत्या उतानृताः॥४॥ अधराञ्चो नि द्रवन्तु सुमत्या उलुलाकृताः। अश्वत्थमित्रं पुरुषं ये ऽवाताः पृतन्यन्ति॥५॥ - पै.सं. २.५५

*अश्वम् अग्निम् आज्यम् इन्द्रं तान् उ कृण्वे मनोजवान्। अग्निश् चरुम् इवार्चिषा कामो विध्यतु त्वा मम प्र पतानु ममाध्यः ॥११॥ शयानम् अग्न आसीनम् अश्वत्थस्य सवासिनौ। चरतुम् उपतिष्ठन्त समाधीभिर् वि विद्ध्यतं ? प्र पतानु ममाध्यः॥१२॥ चरन्ति स्थ तिष्ठन्तमासीदमुपसंसति?। रेष्मा तृणम् इव मथ्नातु वहन् कामरथो मम प्र पतानु ममाध्यः॥१३॥ यथेन्द्रायासुरान् अरन्धयद् बृहस्पतिः। एवा त्वम् अग्ने अश्वत्थान् अमून् मह्यम्? इहा नय प्र पतानु ममाध्यः॥१४॥ अहं ते मन आ ददे गुडेन सह मेदिना॥ देवा मनुष्या गन्धर्वास् ते मह्यं रन्धयन्तु त्वा प्र पतानु ममाध्यः॥१५॥ यथाश्वत्थस्य पर्णानि निलयन्ति कदा चन। एवासौ मम कामेन माव स्वाप्सीत् कदा चन प्र पतानु ममाध्यः॥१६॥ - पै.सं. ९.२५.११

*अश्वत्थो देवसदनस् तृतीयस्याम् इतो दिवि। तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत॥ देवेभ्यो अधि जातो ऽसि सोमस्य सखा हितः। स प्राणायापानाय चक्षुषे ऽस्य मृळ॥ - पै.सं. १९.११.१

*शमीम् अश्वत्थ आरूढस् तत्र पुंसवनं कृतम्। तद् एव तस्य भेषजं यत् स्त्रीष्व आ हरन्ति तत्॥ पुंसि वै रेतो भवति तत् स्त्रियाम् अनु षिच्यते। तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् प्रजापतिर् अब्रवीत्॥ - पै.सं. १९.१२.१

*य इन्द्रस्य सभाधानं यस्मिन् समितिम् आसते। हिरण्या यस्य पर्णानि तस्मा अश्वत्थ ते नमः॥१२॥ यश् शाखाभिर् अन्तरिक्षम् आ पुर एति निष्ट्यः। छन्दांसि यस्य पर्णानि तस्मा अश्वत्थ ते नमः॥१३॥ यं मृगो न समाप्नोति पक्षाभ्यां शकुनिः पथम्। दिवं यस् संस्तभ्नाति तस्मा अश्वत्थ ते नमः॥१४॥ - पै.सं. १९.१९.१२

*राष्ट्र में विशः के प्रवेश न करने पर इष्टि – इ॒ध्मेऽपि॑ म॒यूखा॒न्त्सं न॑ह्येदनपरु॒ध्यमे॒वाव॑ गच्छ॒त्याश्व॑त्था भवन्ति म॒रुतां॒ वा ए॒तदोजो॒ यद॑श्व॒त्थः ओज॑सै॒व विश॒मव॑ गच्छति स॒प्त भ॑वन्ति स॒प्तग॑णा॒ वै म॒रुतो॑ गण॒श ए॒व विश॒मव॑ गच्छति। – तै.सं. २.३.१.५

* यत् प॑र्ण॒मयी॑ जु॒हूर्भव॒त्याश्व॑त्थ्युप॒भृद्रा॒ष्ट्रमे॒व वि॒श्यध्यू॑हति रा॒ष्ट्रं वै प॒र्णो विड॑श्व॒त्थो – तै.सं. ३.५.७.२

विड् – मरुतः

*अश्वत्थो वै वनस्पतीनाँँ सपत्नसाहो विजित्यै – तै.सं. ५.१.१०.२

*अ॒ग्निर्दे॒वेभ्यो॒ निला॑यत। अश्वो॑ रू॒पं कृ॒त्वा। सो॑ऽश्व॒त्थे सं॑वत्स॒रम॑तिष्ठत्। तद॑श्व॒त्थस्या॑श्वत्थ॒त्वम्। यदाश्व॑त्थः संभा॒रो भव॑ति। यदे॒वास्य॒ तत्र॒ न्य॑क्तम्। तदे॒वाव॑रुन्द्धे। – तै.ब्रा. १.१.३.९

साधना के दृष्टिकोण से, हमें हमें कोई भी अनुभूति हो – क्षुधा की, तृषा की, दुःख की, सुख की, भय की, क्रोध की, वह अग्नि का, वाक् का एक रूप है। वह स्थानिक नहीं रहनी चाहिए, अपितु सारी देह में व्याप्त होनी चाहिए। वह अग्नि का अश्व रूप हो सकता है।

*राजसूये अभिषेकः -- आश्व॑त्थेन॒ (पात्रेण) वैश्यः॑ (अभिषिञ्चति)। विश॑मे॒वास्मि॒न्पुष्टिं॑ दधाति।(पर्णमयेन अध्वर्युः - - -औदुम्बरेण राजन्यः - - - नैयग्रोधेन जन्यः - - -) – तै.ब्रा. १.७.८.७

*अश्वमेधे प्रथममहः – आश्व॑त्थो व्र॒जो भ॑वति। प्र॒जाप॑तिर्दे॒वेभ्यो॒ निला॑यत। अश्वो॑ रू॒पं कृ॒त्वा। सो॑ऽश्व॒त्थे सं॑वत्स॒रम॑तिष्ठत्। तद॑श्व॒त्थस्या॑श्वत्थ॒त्वम्। यदाश्व॑त्थो व्र॒जो भव॑ति। स्व ए॒वैनं॒ योनौ॒ प्रति॑ष्ठापयति। - तै.ब्रा. ३.८.१२.२

*उपवसथ ब्राह्मणम् – तस्य सर्पिरासेचनं कृत्वा सर्पिरासिच्य, आश्वत्थीस्तिस्रः समिधो घृतेनान्वज्य, समिद्वतीभिर्घृतवतीभिर्ऋग्भिरभ्यादधाति शमीगर्भमेतदाप्नुमः इति वदन्तः। - मा.श. २.१.४.५

*स यदेवादोऽश्वत्थे तिष्ठत इन्द्रो मरुत उपामन्त्रयत। तस्मादाश्वत्थेषु पलाशेषूपनद्धा भवन्ति। विशोऽनूदस्यन्ति। विशो वै मरुतः। - मा.श. ५.२.१.१७

*रत्नहविषामुपरि यागः – तस्यावृत्। या स्वयम्प्रशीर्णाऽऽश्वत्थी शाखा प्राची वोदीची वा भवति। तस्यै मैत्रं पात्रं करोति। वरुण्या वाऽएषा – या परशुवृक्णा।– मा.श. ५.३.२.५

*अथाश्वत्थं (पात्रं) भवति। तेन वैश्योऽभिषिञ्चति। यदेवादोऽश्वत्थे तिष्ठते इन्द्रो मरुत उपामन्त्रयत। मा.श. ५.३.५.१४

*पुरूरवा-उर्वशी आख्यानम् – तिरोभूतं योऽग्निः अश्वत्थं तं, या स्थाली शमीं ताम्। - -ते होचुः – संवत्सरं चातुष्प्राश्यमोदनं पच। स एतस्यैवाश्वत्थस्य तिस्रस्तिस्रः समिधो घृतेनान्वज्य समिद्वतीभिर्घृतवतीभिर्ऋग्भिरभ्याधत्तात्। स यस्ततोऽग्निर्जनिता, स एव स भवितेति। ते होचुः - परोऽक्षमिव वा एतत्। आश्वत्थीमेवोत्तरारणिं कुरुष्व, शमीमयीमधरारणिम्। स यस्ततोऽग्निर्जनिता, स एव स भवितेति। ते होचुः - परोऽक्षमिव वा एतत्। आश्वत्थीमेवोत्तरारणिं कुरुष्व, आश्वत्थीमधरारणिम्। स यस्ततोऽग्निर्जनिता, स एव स भवितेति। स आश्वत्थीमेवोत्तरारणिं चक्रे, आश्वत्थीमधरारणिम्। स यस्ततोऽग्निर्जज्ञे। स एव स आस तेनेष्ट्वा गंधर्वाणामेक आस। - मा.श. ११.५.१.१३

*त्वच एवास्यापचितिरस्रवत्सोऽश्वत्थो वनस्पतिरभवत् – मा.श. १२.७.१.९

*सौत्रामणी यज्ञात् पुरुषोत्पत्तिः – मतस्ने एवास्याश्वत्थं च पात्रमौदुम्बरं च।– मा.श. १२.९.१.३

मतस्ने – वृक्कौ वर्तुलौ – सायण भाष्य

*अथ हाहीनसम् आश्वत्थिं केशी दार्भ्यः केशिनस् सात्यकामिनः पुरोधाया अपरुरोध। स ह स्थविरतरो ऽहीना आस कुमारतरः केशी। - - - -जै.ब्रा. १.२८५

*दर्भम् उ ह वै शातानीकिं पाञ्चाला राजानं सन्तं नापचायांचक्रुः। अपि ह स्मैनं कुमारा दर्भ दर्भेति ह्वयन्ति। तस्य हैतौ ब्राह्मणाव् आसतुर् अहीना आश्वत्थिः केशी सात्यकामिर् इति। तौ हैनम् उपसमेयतुः। - -- -तं होचतुर् – अपचितिर् इति वा अयं यज्ञक्रतुर् अस्ति, तेन त्वा याजयावेति। - जै.ब्रा. २.१००

*तस्य हैते ब्राह्मणा आसुर् – अहीना आश्वत्थिः, केशी सात्यकामिर्, गङ्गिना राहक्षितो, लुशाकपिः खार्गलिर् इति। - जै.ब्रा. २.१२२

*तद् आहुस् – त्रय स्तोका आगच्छन्तीत्य् उदस्तोको घृतस्तोको मधुस्तोकः। ततो य उदस्तोक इमां स प्रविशत्य्, ओषधीर् घृतस्तोको, वनस्पतीन् मधुस्तोकः। तद् धैतं मीमांसांचक्रुर् आमलक अकूवयेयो ऽहीना आश्वत्थिः केशी दार्भ्यः – किं स्तोकं त्वम् आगच्छन्तं मन्यसे, किं स्तोकं त्वं, किं स्तोकं त्वम् इति। स होवाच केशी – घृतस्तोकम् अहं मन्य इति। अथ होवाचाहीना – मधुस्तोकम् अहं मन्य इति। अथ होवाचामलक – उदस्तोकम् अहं मन्य इति। - जै.ब्रा. ३.३५०

*अश्वो वै भूत्वाग्निर्देवेभ्योऽपाक्रामत् स यत्रातिष्ठत् तदश्वत्थस्समभवत्, तदश्वत्थस्याश्वत्थत्वम् – काठ.सं. ८.२

*विशो वै वीर्यमपाक्रामत् तदश्वत्थं प्राविशत्, तस्मादेवोऽधृतस्सर्वाहा पर्णमेजयंस्तिष्ठति यदश्वत्था भवन्ति – काठ.सं. ११.६

*अश्वत्थे वो (ओषधीनाम्) निषदनम् – काठ.सं. १६.१३, कपि.क.सं. २५.४

*एष (अश्वत्थः) वै वनस्पतीनाँँ सपत्नसाहः – काठ.सं. १९.१०, कपि.क.सं. ३०.८

*अश्वत्थेन वनस्पतयः (अन्वाभूयन्त) – काठ.सं. ३५.१५

*विष्णुर्देवताश्वत्थो नक्षत्रम् – काठ.सं. ३९.१३

*ततः (अश्वस्य) शकाछ्वसी (शकृतःश्वसी) अजायत, तत्पार्श्वान्मध्याच्चाश्वसद् यत्पार्श्वान्मध्याच्चाश्वसत् तदश्वत्थोऽजायत तस्य वेदो मूलं पर्णानि छन्दांसि – काठ.संकलन १८:१-३

*अग्नेर्वै सृष्टस्य तेजा उददीप्यत, तदश्वत्थं प्राविशत्, यदाश्वत्थीः समिध आदधाति तेज एवावरुन्धे – मै.सं. १.६.५

*अग्निर्वै वरुणं ब्रह्मचर्यमागछत् प्रवसन्तं, तस्य जायाँँ समभवत्, - - - - यद्रेता आसीत् सोऽश्वत्थ आरोहोऽभवत्, यदुल्बँँ सा शमी – मै.सं. १.६.१२

*प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा रिरिचानोऽमन्यत, सोऽश्वो भूत्वा संवत्सरं न्यङ् भूम्याँँ शिरः प्रतिनिधायातिष्ठत्, तस्याश्वत्थो मूर्ध्न उदभिनत् – मै.सं. १.६.१२

*विशो वीर्यमपाक्रामत्, तदश्वत्थं प्राविशत् स तेन वीर्येण भर्भराभवत् – मै.सं. २.२.१

*तेजसो वा एष वनस्पतिरजायत यदश्वत्थः – ऐ.ब्रा. ७.३२

*साम्राज्यं वा एतद्वनस्पतीनाम् (यदश्वत्थः) – ऐ.ब्रा. ७.३२, ८.१६

*ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन एतद्वै तत्। यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति। - कठोपनिषद २.३.१

*अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयँँ सरस्तदश्वत्थः सोमसवनः - - - छां.उ. ८.५.३

*यथाश्वत्थदले सूक्ष्माः स्थूलाश्च (नाडयः) विततास्तथा। - त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद २.७६

*ऊर्ध्वमूलं त्रिपाद्ब्रह्म शाखा आकाशवाय्वग्न्युदकभूम्यादय एकोऽश्वत्थनामैतद्ब्रह्मैतस्यैतत्तेजो यदसावादित्यः। ओमि्त्येतदक्षरस्य चैतत्। - मैत्रायण्युपनिषद ६.४

*यथाऽश्वत्थादिपत्रं शिराभिर्व्याप्तमेवं शरीरं नाडीभिर्व्याप्तम्। प्राणापानसमानोदानव्याना नागकूर्मकृकरदेवदत्तधनञ्जया एते दश वायवः सर्वासु नाडीषु चरन्ति। - शाण्डिल्योपनिषद १.४

*खादिरः स्रुवः पर्णमयी जुहूराश्वत्थ्युपभृद्वैकङ्कती ध्रुवा। - आप.श्रौ.सू. १.१५.१०

*यो अश्वत्थः शमीगर्भ आरुरोह त्वे सचा। तं ते हरामि ब्रह्मणा यज्ञियैः केतुभिः सहेति शमीगर्भस्याश्वत्थस्यारणी आहरति। अप्यशमीगर्भस्येति वाजसनेयकम्। अश्वत्थाद्धव्यवाहाद्धि जातामग्नेस्तनूं यज्ञियां संभरामि। शान्तयोनिं शमीगर्भमग्नये प्रजनयितवे। आयुर्मयि धेह्यायुर्यजमान इत्यरणी अभिमन्त्र्य सप्त पार्थिवान्संभारानाहरति। - आप.श्रौ.सू. ५.१.२

*अश्वो रूपं कृत्वा यदश्वत्थे ऽतिष्ठः संवत्सरं देवेभ्यो निलाय। तत्ते न्यक्तमिह संभरन्तः शतं जीवेम शरदः सुवीरा इत्यश्वत्थम्। - आप.श्रौ.सू. ५.२.४

*अथ ब्रह्मौदनशेषं संकृष्य तस्मिन्नाज्यशेषमानीय तस्मिंश्चित्रियस्याश्वत्थस्य तिस्रः समिध आर्द्राः सपलाशाः प्रादेशमात्र्यः स्तिभिगवत्यो विवर्तयति। - आप.श्रौ.सू. ५.५.१०

स्तिभिगवत्यः – फलवत्यः। विवर्तयति – विलोडयति – रुद्रदत्त भाष्य

*चित्रियादश्वत्थात्संभृता बृहत्यः शरीरमभिसंस्कृता स्थ। प्रजापतिना यज्ञमुखेन संमितास्तिस्त्रिवृद्भिर्मिथुनाः प्रजात्या इति। - आप.श्रौ.सू. ५.६.१

*तस्मिन्नुपव्युषमरणी निष्टपति जातवेदो भुवनस्य रेत इह सिञ्च तपसो यज्जनिष्यते। अग्निमश्वत्थादधि हव्यवाहं शमीगर्भाज्जनयन्यो मयोभूः। अयं ते योनिर्ऋत्विय इत्येताभ्याम्। - आप.श्रौ.सू. ५.८.५

उपव्युषं – उषःसमीपे – रुद्रदत्त भाष्य

*अर्धोदिते सूर्य आहवनीयमादधाति। - - गार्हपत्ये प्रणयनीयमाश्वत्थमिध्ममादीपयति सिकताश्चोपयमनीरुकल्पयते। - आप.श्रौ.सू. ५.१३.३

*अग्न आयूंषि पवसे ऽग्ने पवस्व स्वपाः। अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयमिति तिस्र आश्वत्थ्यः समिध एकैकस्मिन्(सभ्ये, आवसथ्ये, आहवनीये) आदधाति। - आप.श्रौ.सू. ५.१७.२

*- - - अभिमृताः स्मः परिधं नः कुर्विति पालाशमिध्ममुपसमाधायेमं मे वरुण तत्त्वा यामि त्वं नो अग्ने स त्वं नो अग्ने त्वमग्ने अयासि प्रजापत इति षडाहुतीर्हुत्वेमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि - - - -। नैय्यग्रोध इध्मः क्षत्रियस्य राष्ट्रमर्यादायाम्। आश्वत्थो वैश्यस्य क्षेत्रमर्यादायाम्। - आप.श्रौ.सू. ९.१२.४

अभिमृताः – येषां कुले पुनःपुनर्मरणं प्रवृत्तं स्यात्। - - -वैश्यस्य यत्क्षेत्रं तत्सीम्नि आश्वत्थ इध्म उपसमाधेयः। - रुद्रदत्त भाष्य

*अग्निष्टोम प्रातःसवनम् – ते अपरेण प्रबाहुगृतुपात्रे आश्वत्थे अश्वशफबुध्ने उभयतोमुखे। दक्षिणमध्वर्योः। उत्तरं प्रतिप्रस्थातुः – आप.श्रौ.सू. १२.१.१३

*अग्निचयनम् – दंष्ट्राभ्यां मलिम्लूनित्याश्वत्थीं समिधमादधाति। - - -आप.श्रौ.सू. १६.१०.३

*वाजपेये यजमानस्य यूपारोहणम् – तमाश्वत्थैरासपुटैरूषपुटैरुभयैर्वा वैश्याः प्रतिदिशमर्पयन्ति। - आप.श्रौ.सू. १८.५.१६

*राजसूये अभिषेकः – पालाशेन पुरस्तादध्वर्युः। एवमितरे।  औदुम्बरेण दक्षिणतो ब्रह्मा। राजन्यो वा। आश्वत्थेन पश्चाद्वैश्यः। नैयग्रोधेनोत्तरतो जन्यमित्रम्। - आप.श्रौ.सू. १८.१६.४

*यदि नावगच्छेत्(संग्रामात्?) आश्वत्थान्मयूखान्सप्त मध्यमेषायामुपहन्याद् इदमहमादित्यान्बध्नाम्यामुष्मादमुष्यै विशो ऽवगन्तोरिति। - आप.श्रौ.सू. १९.२०.१५

*अश्वमेधः – ऊर्ध्वमेकादशान्मासादाश्वत्थे व्रजे ऽश्वं बध्नन्ति। तस्मै बद्धाय यवसमाहरन्ति। - आप.श्रौ.सू. २०.७.७

*अश्वमेधः – संस्थिते ऽहन्यभित आहवनीयं षट्-त्रिंशतमाश्वत्थानुपतल्पान्मिन्वन्ति। - आप.श्रौ.सू. २०.१०.४

*आश्वत्थि हविर्धानमाग्नीध्रं च। - आप.श्रौ.सू. २३.१२.१४