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PURAANIC SUBJECT INDEX (From Mahaan to Mlechchha ) Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar
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मान्धाता गद्दी, ओंकारेश्वर मन्दिर, मध्यप्रदेश
मान्धाता गद्दी के बाईं ओर का दृश्य
पुराणों में
सार्वत्रिक रूप से(भागवत
९.६.३० आदि) चक्रवर्ती
राजा मान्धाता का उल्लेख मिलता है जो युवनाश्व का पुत्र है और बिन्दुमती का पति है।
गर्ग
संहिता
४.१५+ के अनुसार मांधाता
अपनी ५० कन्याओं को सौभरि ऋषि को अर्पित कर देता है। ऋग्वेद
१०.१३४ सूक्त की प्रथम ६ ऋचाओं का
ऋषि मान्धाता है तथा सातवीं ऋचा का ऋषि गोधा है। प्रथम ऋचा में कहा गया है कि
इन्द्र ने दोनों रोदसियों(द्यौ व पृथिवी) का विस्तार उषा की भांति कर दिया। प्रथम ६
ऋचाओं की टेक देवी जनित्र्यजीजनत् भद्रा जनित्र्यजीजनत् है। मान्धाता की पत्नी के
रूप में बिन्दुमती का उल्लेख यह संकेत देता है कि मान्धाता की चेतना बिन्दुमात्र
है, उसका व्यावहारिक जीवन में विस्तार नहीं हुआ है। यही कारण है कि मान्धाता अपनी
५० कन्याओं को सौभरि – सु का भरण करने वाले को सौंप देता है। सु अर्थात् व्यवहार को
सुन्दर बनाना। ऋग्वेद के सूक्त में भी एक ओर देवी जनित्री है तो दूसरी ओर भद्रा
जनित्री। भद्रा अर्थात् जिसके पाप नष्ट हो गए हैं।
मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर मन्दिर के स्थलपुराण के अनुसार मान्धाता द्वीप में
मान्धाता ने जहां तप किया था, उस स्थान पर ओंकारेश्वर मन्दिर है। ओंकार की साधना का
लक्ष्य भी सु की प्राप्ति हो सकता है। गर्ग संहिता में मान्धाता यमुना नदी के
माहात्म्य का श्रवण करता है, किन्तु ओंकारेश्वर मन्दिर नर्मदा नदी के तट पर है। कहा
गया है कि गंगा का जल गोमूत्र के समान है, सरस्वती का जल गोपयः के समान है एवं
नर्मदा का जल दधि के समान है। डा. फतहसिंह का कथन है कि पयः आनन्दमय कोश में होता
है, दधि विज्ञानमय कोश में। दधि में घृत जमी हुई अवस्था में रहता है। घृत को
निकालने के लिए दधि का मन्थन करना पडता है। इसी प्रकार अन्नमय, प्राणमय एवं मनोमय
कोशों में विज्ञानमय कोश की अतिमानसिक चेतना का अवतरण कराने के लिए विशेष प्रयास की
आवश्यकता पडती है।
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